Thursday , July 18 2019

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मुरारी महाविभाजनकारी

मुरारी महाविभाजनकारी | टाइम के मुखपृष्ठ पे फोटो अय हय रे बलिहारी || कवि ने तो पहले ही कहा था किन्तु आप नहीं माने | महात्म्य और चालीसा फिर लिख कर पड़े सुनाने || सत्ता का षड़यन्त्र देख रही जनता सब बेचारी | मुरारी महाविभाजनकारी || जाति-धर्म और ऊँच-नीच में …

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आज इसका जन्मदिन मनाने चला….

तात का फर्ज मैं तो निभाने चला आज इसका जन्मदिन मनाने चला बेटा-बेटी में फर्क हमको आता नहीं अपनी गुड़िया को मैं तो सजाने चला अपनी बातों से सबको मनाती है वो दर्द अपना भी मैं तो भुलाने चला चीं चीं करती है चिड़ियों सी चारो तरफ बात इसकी ये …

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रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है….

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं.. कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है .. चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती …

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हमारी अपनी बात को सुनता कौन है अब…..

हमारी अपनी बात को सुनता कौन है अब जहां देखो लोग अपनी धुनी रमाये हैं अब दुखों का देखो गर्म बाज़ार है अब नफरत के बीच सहमा सौहार्द है अब किसी को किसानों का दर्द दिखता है अब किसी को युवाओं का मर्म दिखता है अब नोटबंदी, जीएसटी ने कितनों …

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शांति का अभिनंदन

नफरत की मौत और मोहब्बत की नई जिंदगी का अभिनंदन सिसकती अशांति के अंधेरों में पैदा होती शांति के उजाले की किरण का अभिनंदन अभिनंदन नई सुबह का जिसने अंधेरे छांट दिये जिसने विध्वंस टाल दिये मौत की उड़ान भरती नफरत की सियासत के पंख काट दिये अभिनंदन जिन्दगी का …

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जंग ना होने देंगे, हम जंग ना होने देंगे !!

जंग ना होने देंगे, हम जंग ना होने देंगे !! हमें चाहिए शांति, ज़िन्दगी हमको प्यारी  हमें चाहिए शांति, सृजन की है तयारी ! हमने छेड़ी जंग भूख से बीमारी से, आगे आकर हाथ बढाए दुनिया सारी, हरी भरी धरती को खुनी रंग न लेने देंगे ! जंग न होने …

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अटल जी के जन्मदिवस पर आडवाणी जी का दर्द बयां करती मेरी कालजयी रचना

बेवफा छोड़कर वो घोसला उड़ने के क़ाबिल हो गया,  बेवफाओं में अब उसका नाम शामिल हो गया। शाख़ तक जाना चहकना मैंने सिखलाया जिसे, वो परिन्दा आसमां जाने के क़ाबिल हो गया। फूस के इक झोंझ में रहता था वो महफूज था, मौज की लालच में वो नादान ग़ाफिल हो …

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कलीम आजिज़ की ग़ज़ल: दामन पे कोई छींट…

मेरे ही लहू पर गुज़र-औक़ात करो हो मुझ से ही अमीरों की तरह बात करो हो दिन एक सितम एक सितम रात करो हो वो दोस्त हो दुश्मन को भी तुम मात करो हो हम ख़ाक-नशीं तुम सुख़न-आरा-ए-सर-ए-बाम पास आ के मिलो दूर से क्या बात करो हो हम को …

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लोगों को मुश्किल में डालकर 12 रबी-अल-अव्वल मनाना कितना जायज़, कितना नाजायज़ ?

Kavish Aziz Lenin निहायत ही जहालत की तरफ मज़हब के लोग रुख कर चुके हैं, एक मज़हब जिसमे साफ़ तौर पर लिखा है कि फ़िज़ूल खर्च, दिखावा, शिर्क और बिदत कि माफ़ी नही है वहां इस तरह बारावफात की तैयारी में पूरी रात लाउड स्पीकर पर नात और सलाम पढ़ …

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