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रायबरेली के “अली मियां ” सऊदी अरब के बादशाह के अलावा वे इकलौते शख्स थे जिन्हें “खान-ए-काबा” की चाबी सौंपी गई थी

अली मियां भारत ही नहीं बल्कि दुनिया भर के चर्चित शख्सियतों में से एक थे. खासकर इस्लामी दुनिया में इनकी लोकप्रियता काफी ज्यादा थी

अली मियां एक ऐसी शख्सियत थे जिनके प्रशंसकों में देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और राजीव गांधी तक के नाम शामिल हैं. उन्होंने कई मौकों पर सरकार, राजनीतिक पार्टियों और मुस्लिम समुदाय के बीच पुल का काम किया. आइए जानते हैं मौलाना अली मियां की शख्सियत के बारे में…

अबुल हसन अली हसानी नदवी का जन्म 24 नवंबर 1914 को रायबरेली में हुआ था. 85 की उम्र में 1999 में उनका निधन हो गया था. उन्होंने अलग-अलग भाषाओं में करीब 50 से ज्यादा किताबें लिखीं. उन्हें प्यार से लोग ‘अली मियां’ बुलाते थे.

अली मियां की शुरुआती पढ़ाई लिखाई रायबरेली के तकिया इलाके में हुई. अपनी मां से कुरान की शिक्षा लेने के बाद उन्होंने अरबी, पारसी और ऊर्दू की पढ़ाई की. अली मियां ने अपनी उच्च शिक्षा लखनऊ में स्थित इस्लामिक शिक्षण केंद्र दारुल उलूम नदवातुल उलेमा (नदवा कॉलेज) से प्राप्त की. अबुल हसन अली ने सबसे ज्यादा अरबी भाषा में लिखा. उन्होंने कई सेमिनार्स में हिस्सा लिया और देश-दुनिया के कई हिस्सों में जाकर भाषण दिए. उनकी किताब ‘माजा खासीरल आलम बे इन्हितात अल मुसलमीन’ को अंग्रेजी में ‘इस्लाम ऐंड द वर्ल्ड’ शीर्षक के साथ अनुवादित किया गया.

काबा की चाबी-

अली मियां को मक्का में मुस्लिम वर्ल्ड लीग के पहले सत्र का सचिव बनाया गया था. 1980 में उन्हें किंग फैसल अवॉर्ड, यूएई द्वारा पर्सनैलिटी ऑफ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित किया गया. उन्हें इस्लामिक सेंटर ऑक्सफोर्ड का चेयरमैन भी बनाया गया था. उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1951 में मक्का की दूसरी हज यात्रा के दौरान अबुल हसन अली नदवी के लिए खान-ए-काबा के दरवाजे खोल दिए गए थे. यही नहीं, उन्हें खान-ए-काबा की चाबी भी सौंपी गई  थी. सऊदी अरब के बादशाह के अलावा वे इकलौते शख्स थे जिन्हें ये चाबी दी गई थी.

शाहबानो केस में भूमिका-

मौलाना अली मियां सि्यासत में सक्रिय नहीं रहे हैं, लेकिन मुस्लिम मामलों को लेकर राजनीतिक दलों के साथ पुल का काम करते थे. अली मियां ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (1972) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. देश में करीब एक दशक तक मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक लड़ाइयां उन्हीं के नेतृत्व में लड़ी गईं. शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को अमान्य घोषित कराने में भी उनकी अहम भूमिका रही थी. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने इस फैसले के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. इसके बाद उन्होंने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार से सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानून बनवाने में अहम भूमिका निभाई थी. इसके बाद मुस्लिम वुमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवॉर्स) ऐक्ट, 1986 लाया गया हालांकि इसके खिलाफ तमाम याचिकाएं दायर हुईं.

बाबरी मस्जिद आंदोलन का मार्गदर्शन-

बाबरी मस्जिद मामले में भी मौलाना अली मियां की सक्रिय भूमिका थी. 1986 में मौलाना की सहमति के बाद ही AIMMM और AIMPLB ने बाबरी मस्जिद के पुनरुद्धार का सवाल उठाया. हालांकि इसी दौरान बाबरी मस्जिद के ताले रामलला के दर्शन के लिए खोल दिए गए थे. हालांकि, वह सीधे तौर पर बाबरी मस्जिद आंदोलन से नहीं जुड़े थे लेकिन सरकार से लेकर हिंदू प्रतिनिधियों से समझौते को लेकर हर मुश्किल वक्त पर उन्होंने मार्गदर्शन किया. बाबरी मस्जिद विंध्वंस के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उनकी अध्यक्षता में मामले की जांच और कार्यवाही पर आगे बढ़ा. वह हर विवाद को लोकतांत्रिक दायरे में रहकर सुलझाने के पक्षकार थे ना कि किसी तरह के धार्मिक उन्माद में.

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