Saturday , August 24 2019

विश्व बैंक ने अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना से हाथ खींचा, लोगों को मिली बड़ी सफ़लता

एक बड़े ऐतिहासिक कदम, जिसका प्रभाव कई स्तर पर देखने को मिलेगा, उठाते हुए कल विश्व बैंक ने आंध्र प्रदेश के अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना में $300 मिलियन का क़र्ज़ देने से इनकार कर दिया।

इस फैसले का वर्किंग ग्रुप ऑन इंटरनेशनल फाइनेंसियल इंस्टिट्यूशन (WGonIFIs) और परियोजना से प्रभावित समुदायों ने जोरदार सराहना की। पिछले कुछ वर्षों से कई जन आंदोलनों और नागरिक संगठनों से आपत्ति प्राप्त करने और बैंक के जवाबदेही तंत्र ‘इंस्पेक्शन पैनल’ को प्रभावित समुदायों द्वारा मिले शिकायतों के बाद बैंक ने यह फैसला लिया है।

इस फैसले पर मेधा पाटकर, नर्मदा बचाओ आंदोलन और जन आंदोलनों का राष्ट्रीय समन्वय (NAPM) की वरिष्ठ कार्यकर्ता, ने कहा कि हमें खुशी है कि विश्व बैंक ने अमरावती कैपिटल सिटी परियोजना में शामिल व्यापक उल्लंघनों का संज्ञान लिया। यह परियोजना लोगों की आजीविका और वातावरण के लिए एक बड़ा खतरा रही है। नर्मदा और टाटा मुंद्रा के बाद, यह विश्व बैंक समूह के खिलाफ लोगों की तीसरी बड़ी जीत है। हमें खुशी है कि नर्मदा बचाओ आंदोलन के संघर्ष के कारण बनाए गए ‘इंस्पेक्शन पैनल’ ने यहां अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज जब हम लोगों के संघर्ष और उनकी जीत का जश्न मना रहे हैं, वो लोग जो राज्य की धमकियों और आतंक के खिलाफ खड़े रहते है, तब हम सरकार और वित्तीय संस्थानों को भी चेतावनी देते हुए बताना चाहते हैं कि बिना लोगों की सहमति के अपने एजेंडे को आगे ना बढ़ाये।

कैपिटल रीजन फार्मर्स फेडरेशन के मल्लेला शेषगिरी राव ने कहा, “हमारी जमीन और आजीविका के ऊपर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे थे। इस डर और चिंता ने हमारी आँखों से नींद छीन ली थी। इस संघर्ष ने हमारे जीवन में ऐसी जगह बना ली है जिसे हम कभी भूल नहीं सकते हैं। हमें यह पूरी उम्मीद है कि विश्व बैंक के इस परियोजना से बाहर निकलने से राज्य और अन्य देनदारों को एक बड़ा संदेश जाएगा और वो ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ लोगों की चिंताओं का संज्ञान लेंगे।“

परियोजना से जुड़े एक अन्य सह-वित्तदाता एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (एआईआईबी) ने खुद को प्रसिद्द पेरिस एग्रीमेंट के बाद के समय में उभरते बैंक के रूप में पेश करते हुए जाहिर किया है कि वह जलवायु परिवर्तन और इसके संकटों से निपटने के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन अभी भी यह परियोजना उनके आधिकारिक दस्तावेजों में विचाराधीन परियोजना के रूप में मौजूद है और दस्तावेज के मुताबिक़ एआईआईबी को इस परियोजना में केवल एक सह-वित्तदाता के रूप में दर्ज किया गया है। जिसका इस्तेमाल कर के एआईआईबी ने इस परियोजना में विश्व बैंक की नीतियों का उपयोग किया है, लेकिन अब विश्व बैंक के इस परियोजना से बाहर आने के बाद एआईआईबी की सह-वित्तदाता के रूप में स्थिति अस्पष्ट है।

“एक अच्छे बदलाव के लिए, सकारात्मक सोच ने बैंक को इस विनाशकारी कार्यक्रम से हटने के निर्णय लेने पर विवश किया। यह हमारे रुख को भी स्पष्ट करता है, कि पेरिस एग्रीमेंट के बाद उभरने वाले बैंक की बयानबाज़ी के बावजूद, एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक (AIIB), जो इस परियोजना में एक सह-वित्तपोषक है, अब और विश्व बैंक के पीछे छिप नहीं सकता है, जो अब तक वह एक सह- वित्तदाता के रूप में बताकर कर रहा था।”, एनजीओ फोरम ऑन एडीबी के अंतर्राष्ट्रीय समिति और एन्विरोनिक्स ट्रस्ट के डायरेक्टर, श्रीधर आर ने कहा।

सेंटर फ़ॉर फ़ाइनेंशियल अकाउंटिबिलिटी के एलेक्स टैनी ने कहा, “यह जन शक्ति का एक और उदाहरण है जो विश्व बैंक जैसी संस्थानों को भी लोगों के आपत्तियों की जवाबदेह बनने पर मजबूर करता है। जब परियोजना से प्रभावित लोग अपनी आवाज़ पर बुलंद और मजबूती से खड़े थे, उसी समय कई अन्य संगठनों ने समर्थन में उनके मुद्दे और आवाजों को उचित जगहों तक पहुंचाया। यह न्याय एवं जवाबदेही ले लिए लड़ रहे लोगों और उनके मजबूत मांगों की जीत है।”

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