Saturday , September 21 2019

नज़र अख़्लाक के वो पुर संकू मंज़र नहीं आते 

ग़ुलाम मोहम्मद खांन’आलम’ +91 9175124612

नज़र अख़्लाक के वो पुर संकू मंज़र नहीं आते
गले में बांह डाले श्याम और अख़्तर नहीं आते ।

खिलौने भी है सहमे से उदासी उनके छाई है
उन्हें अब खेलने बच्चे सभी मिल कर नहीं आते ।

न बच्चों में बहलता है न चौकें में किसी का दिल
वो जब तक लौट कर महफ़ूज़ घर शौहर नहीं आते ।

ये किसने नफरतों के बीज बोया है ख़ुदा जाने
पड़ोसी भी अब पहले से हमारे घर नहीं आते ।

न भड़काते कोई नफ़रत की चिंगारी जो हर दिल में
न जलाते घर कोई और हाथ में ख़ंजर नहीं आते ।

ये कैसे रहनुमा है क़ौम के उंगली दिखाते हैं
लगा कर राह पर सबको जो मर्क़ज़ पर नहीं आते ।

ये नाहक़ दुश्मनी आपस की ये रंजिश ज़माने में
कहां ले जाएगी तूफ़ान तो कह कर नहीं आते ।

ख़िलाफ़त हक़ से ना अबराह की हद से गुज़र जाती
अबाबीलों के लश्कर से कभी पत्थर नहीं आते ।

बदल दे सोच दुनिया की जो ज़हनों दिल तलक पहुंचे
ख्यालों में कुछ ऐसे शेर भी बरतर नहीं आते ।

जहांने नौ की उम्मीदें लिए हम ख़ुश्क आंखों में
जो बह जाए ख़ुशी से अश्क़ के गौहर नहीं आते ।

चलो ढूंढे कहीं ‘आलम’ नई इख़लाक़ की दुनिया
हमारे साथ लेकिन कोई भी रहबर नहीं आते ।

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