Saturday , September 21 2019

मुसलमानों को आपराधिक प्रवृत्ति का मानते हैं देश के आधे पुलिसवाले- सर्वे

एक एनजीओ द्वारा ये सर्वे ये जानने के लिए किया गया कि आखिर पुलिसकर्मियों के कामकाज के हालात किस तरह के हैं. इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे चेलमेश्वर ने जारी किया.

देश के हर दो मे से एक पुलिसकर्मी को लगता है कि मुसलमान का अपराध की तरफ स्वाभाविक रूप से झुकाव होता है. सर्वे की रिपोर्ट ‘2019 Status of Policing in India’ के अनुसार देश के 48% पुलिसकर्मियों को लगता है कि मुसलमान आपराधिक प्रवृत्ति के होते हैं. 35 फीसदी पुलिसकर्मियों को लगता है कि दुष्कर्म और गो-हत्या के मामले में लोगों का मारपीट करना स्वाभाविक है. दूसरी ओर, 56% पुलिसकर्मियों का मानना है कि ऊंची जाति के हिंदू अपराध की ओर नहीं जाते.

लोकनीति और कॉमन कॉज की ओर से मंगलवार को जारी रिपोर्ट में ये खुलासा हुआ है. ये सर्वे ये जानने के लिए किया गया कि आखिर पुलिसकर्मियों के कामकाज के हालात किस तरह के हैं. इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे चेलमेश्वर ने जारी किया. ये सर्वे 31 राज्यों में कराया गया. इस दौरान 12 हज़ार पुलिस कर्मियों से बातचीत की गई. इसके अलावा 11 हज़ार पुलिसवालों के परिवार से भी सवाल पूछे गए.

यह रिपोर्ट पुलिसबल की संख्या और काम करने के हालात को लेकर तैयार की गई है. इस रिपोर्ट को एनजीओ कॉमन कॉज ने सरकार के लोकनीति प्रोग्राम के साथ मिलकर देश की विकसित सोसाइटी के अध्ययन के लिए तैयार किया है. यह रिपोर्ट मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जे. चेलामेश्वर द्वारा रिलीज किया गया.

सर्वे देश के 21 राज्यों और 11000 पुलिस स्टेशन के 12,000 पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है. सर्वे में शामिल पुलिसकर्मियों में से 37 प्रतिशत का ये भी मानना है कि छोटे-मोटे अपराध के लिए सजा देने का अधिकार पुलिस को मिलना चाहिए और इसके लिए कानूनी ट्रायल नहीं होना चाहिए.

पुलिसकर्मियों की बदहाल स्थिति

12 हजार पुलिस वालों के बीच 12 महीने तक किए गए सर्वे के मुताबिक देश में पुलिस वाले औसतन 14 घंटे रोज काम करते हैं, जबकि 80% पुलिसवालों को 8 घंटे से ज्यादा ड्यूटी करनी पड़ती है. हर दो में से एक पुलिसकर्मी ओवरटाइम करता है. पुलिसकर्मियों के 5 में से 3 परिवार वालों को लगता है कि उन्हें रहने के लिए जो मकान दिया गया है, वह घटिया है. हर दो में से एक पुलिस वाले को वीकली ऑफ नहीं मिलता.

सर्वे में थानों की सुविधा के बारे में भी दयनीय तस्वीर सामने आई

हर चार में से तीन पुलिस वालों को लगता है कि उनके काम के घंटों से उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है. सर्वे में थानों की सुविधा के बारे में भी दयनीय तस्वीर सामने आई. 12% थानों में पीने का पानी नहीं है, जबकि 18% ने कहा कि उनके यहां टायलेट नहीं है. इतना ही नहीं, 36% पुलिसकर्मियों ने कहा कि जब कभी ड्यूटी पर इमरजेंसी में जाना हो, तो उनके पास गाड़ी नहीं होती.

SC-ST एक्ट में मामले झूठे और खास मकसद से दर्ज होते हैं 

जातिगत मामले में 5 में से एक पुलिसकर्मी को लगता है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत आने वाले मामले झूठे और किसी खास मकसद से दायर किए जाते हैं. इसी तरह महिलाओं के खिलाफ हिंसा के मामले में उनकी राय पूर्वग्रह से प्रेरित है. हर पांच में एक पुलिसकर्मी को लगता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा के केस फर्जी होते हैं. भीड़ हिंसा को लेकर 35% पुलिस वालों को लगता है कि गो-हत्या का मामला या कोई दुष्कर्म केस सामने आने पर भीड़ का मारपीट पर उतर आना स्वाभाविक होता है. 37% पुलिसकर्मियों ने समान वेतन और भत्ता मिलने पर ये नौकरी छोड़ने पर सहमति जताई.

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