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एक अल्लाह, एक मज़हब, फिर क्यों है शिया-सुन्नी में अंतर, कैसे मनाते हैं मुहर्रम का मातम

दोनों मुसलमान कहलाते हैं. मज़हब एक हैं. दोनों पैगंबर मोहम्मद को मानते हैं. दोनों सिर्फ अल्लाह के आगे झुकते. नमाज़ भी दोनों पर पांच वक़्त की फर्ज़ है. दोनों के मज़हबी अमल एक ही क़ुरान पर आधारित हैं, लेकिन इसके बाद भी शिया और सुन्नी के बीच मतभेद उभरते हैं. इस्लामिक इतिहास की सबसे अहम तारीख़ में से एक मुहर्रम भी दोनों मनाते हैं, लेकिन इसके तरीके आख़िर अलग क्यों हैं. मंगलवार को मुहर्रम की 10वीं तारीख़ यानी आशुरा है. ये वो दिन है जब हुसैन और उनके 72 साथी इस्लाम और इंसानियत के लिए शहीद हो गए थे. आज हुसैन की शहादत का गम मनाया जाएगा. इस गम में शिया सुन्नी दोनों शरीक होंगे, लेकिन इस गम के तरीके भी कुछ अलग हैं.

मुस्लिम पैगंबर मुहम्मद के दुनिया से जाने के बाद से बंट गए
सबसे पहले समझते हैं कि आखिर शिया और सुन्नी पक्ष आखिर बन कैसे गए, जबकि दोनों पैगंबर मोहम्मद को ही मानने वाले थे. विवाद आज का नहीं, बल्कि करीब 1400 साल पुराना है. इस्लाम में खलीफ़ा बनाए जाने का चलन था, जो इस्लाम और मुस्लिमों को आगे ले जाने का काम करते थे. हजरत मुहम्मद पैगंबर 632 ईस्वी में बिना उत्तराधिकारी बनाए ही दुनिया छोड़ गए. उस समय इस्लाम तेजी से फ़ैल रहा था, ऐसे में बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि आखिर मुस्लिमों की रहनुमाई (नेतृत्व) कौन करेगा. एक पक्ष का कहना था कि मुहम्मद साहब ने अपने चचेरे भाई और दामाद हजरत अली इब्ने तालिब को अपना वारिस बनाया. जबकि एक पक्ष ने अगला खलीफ़ा पैगंबर हजरत मुहम्मद के ससुर अबु बक़र को माना. हजरत अली को मानने वाले ही शिया कहलाए और अबु बक़र को मानने वाले सुन्नी कहे गए. यानी मतभेद पैगंबर के उत्तराधिकारी को लेकर ही शुरू हुआ था.

अपना पहला रहनुमा (खलीफ़ा) चुने जाने पर हुए मतभेद
सुन्नी पक्ष ने अबु बक़र को पैगंबर के बाद पहला खलीफ़ा माना. इनके बाद हजरत उमर व हजरत उस्मान खलीफ़ा बने. एक पक्ष (शिया) की मर्जी के मुताबिक हजरत अली इब्ने तालिब (पैगंबर के दामाद) रहनुमा यानी खलीफ़ा तो बने, लेकिन चौथे नंबर पर. एक पक्ष (सुन्नी) ने इन चारों को ही खलीफ़ा स्वीकार किया. वहीं एक पक्ष (शिया) ने हजरत अली इब्ने तालिब को ही खलीफ़ा स्वीकार किया और पहले, दूसरे, तीसरे को खलीफ़ा को नहीं माना और गैर वाजिब बताया. इसलिए शिया पक्ष ने अपने पहले रहनुमा (नेतृत्वकर्ता) की गिनती हजरत अली से की.

कर्बला की जंग को शिया-सुन्नी दोनों क्रूरतम मानते हैं
कर्बला की जंग में शहीद हुए छोटे बेटे हुसैन हजरत अली इब्ने तालिब के बेटे थे. मुआविया (जो कि अल्लाह पर ईमान लाए थे) के बेटे यजीद ने विद्रोह कर दिया. यजीद ने खुद को बादशाह घोषित कर दिया. जबकि हजरत अली के बाद हसन या हुसैन को खलीफ़ा होना था. हसन को कत्लेआम कर दिया गया. इसके बाद यजीद ने हुसैन पर अधीनता स्वीकार करने का दबाव बनाया, जिसे हुसैन ने स्वीकार नहीं किया. यजीद की तानाशाही के आगे वह नहीं झुके. सत्ता हाथ में होने के बाद भी इस्लाम को नहीं मानने वाला और कत्लेआम करने वाला यजीद हुसैन को अपने अधीन करना चाहता था, लेकिन हुसैन ने घुटने नहीं टेके और कर्बला की जंग में अपने 72 साथियों के साथ शहीद हो गए. यह जंग इस्लामी इतिहास की सबसे क्रूरतम जंग मानी गई.

इतना अलग होता है मातम
इस जंग में शहीद हुए हजरत इमाम हुसैन की शहादत का गम शिया-सुन्नी दोनों ही मनाते हैं, लेकिन शिया समुदाय का हजरत अली को पहला खलीफ़ा कहने वाले हजरत अली के बेटे हुसैन की शहादत का मातम बेहद अलग होता है. शिया हजरत अली और हुसैन को खुद के अधिक करीब बताते हैं. वह पहले मुहर्रम से लेकर 10वें मुहर्रम यानी अशुरा (हुसैन की शहादत के दिन) तक मातम मनाते हैं. शहादत वाले दिन हुसैन की याद में खुद का खून बहाते हैं. जबकि सुन्नी ताजिया निकालने के साथ ही एक दूसरे के साथ लाठी और तलवारबाजी कर प्रतीकात्मक जंग करते हैं, लेकिन खुद का खून नहीं बहाते हैं. शिया-सुन्नी दोनों ही पक्ष के लोग हुसैन की याद में अंगारों पर नंगे पैर चलते हैं. मुहर्रम माह के दौरान शिया समुदाय में महिलाएं-पुरुष रंगीन कपड़ों से परहेज़ करते हैं. जबकि सुन्नी ऐसा नहीं करते.

यहां से आए शिया और सुन्नी शब्द
हजरत अली को जिन्होंने पहला खलीफ़ा कहा, उन्होंने खुद को ‘शियत अली’ यानी अली की ओर वाला या अली की पार्टी वाला माना.’ यहीं से इनके लिए शिया बन गया. जबकि अहल-अल सुन्ना से बना सुन्नी शब्द. अहल-अल सुन्ना यानी परम्परा पर यकीन करने वाले. उस परम्परा पर यकीन जो वारिस के तौर पर हजरत मुहम्मद पैगम्बर से शुरू हुई. जिस परम्परा के चलते पैगम्बर मुहम्मद के ससुर अबु बक़र पहले खलीफ़ा बने थे. शियाओं की आबादी दुनिया में बेहद कम है. भारत में शिया सबसे अधिक उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में है. हालांकि इन सब के बीच शिया-सुन्नी एक दूसरे की एकता की बात करते हैं. और मतभेद के पक्षधर में नहीं होते. दोनों ही एक दूसरे से मिलते जुलते हैं लेकिन आपस में शादी ब्याह नहीं करते हैं. लखनऊ और कई अन्य जगहों पर बड़े मौकों पर शिया सुन्नी जॉइंट नमाज भी कराई जाती है, ताकि एक-दूसरे के करीब आ सकें.

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