Wednesday , October 16 2019

“पत्रकार ख़बर लिखता है तो सब उसे पढ़ते हैं लेकिन जब वो खुद खबर बनता है लोगों को पता नहीं चलता।”

Syed Akhtar Ali

वरिष्ठ पत्रकार जावेद काज़िम की लेखनी ने हर ज्वलन्त मुद्दे पर सरकार की बखिया उधेड़ी। लगभग साढ़े तीन दशक से कुछ अधिक समय उन्होंने पतत्कारिता में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। और फिर अचानक दुनिया को अलविदा कहते हुए अंतिम सफर पर निकल गए। हालांकि 57 वर्ष कुछ अधिक नहीं होते लेकिन अल्लाह ताला ने उन्हें इतनी ही उम्र बक्शी थी। जावेद काज़िम के असमायिक निधन से हम सब स्तब्ध हो गए, एकबारगी मीडिया बिरादरी को यकीन ही नहीं हुआ। लेकिन होनी को कौन टाल सका है, सबको एक दिन संसार से विदा होना है कोई आगे, कोई पीछे।

मरहूम पत्रकार की यादें ताज़ा करने और उन्हें खिराजे अकीदत पेश करने के लिए मुख्यमंत्री सचिवालय, एनेक्सी स्थित मीडिया सेंटर में एक शोकसभा आहूत की गई। इस शोकसभा में तकरीबन पांच दर्जन मान्यता प्राप्त पत्रकारों ने शिरकत फरमाकर मरहूम सहाफी जावेद काज़िम को अश्रुपूरित नेत्रों से श्रद्धांजलि प्रस्तुत की। इस मौके पर दो मिनट का मौन रखा गया।

शोकसभा की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के प्रदेश अध्यक्ष भाई हेमंत तिवारी ने की। इस मौके पर जावेद काज़िम के साथ विभिन्न अखबारों में काम कर चुके सहयोगी पत्रकारों ने अपने अनुभव सुनाए तो मीडिया सेंटर का माहौल खासा गमगीन हो गया।

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हेमंत तिवारी ने कहा मरहूम पत्रकार को दावतें देने का बहुत शौक था। उन्हें तो बस दावत देने का बहाना चाहिए होता था। हेमंत भाई ने दुख जताते हुए कहा लेकिन अफसोस इस बात का है जो जावेद भाई की दावतों में मुसलसल शरीक होते थे उनमें से कई चेहरे आज यहां नदारद हैं। अध्यक्ष ने कहा जावेद भाई से मेरी लगातार बातचीत और मुलाक़ात होती थी। एक बार उन्होंने मुझे दावत पर बुलाया मैं नहीं पहुंच सका। दोबारा फिर उन्होंने मुझे अपने घर पर दावत दी, इस बार भी मैं नहीं पहुंच सका। तीसरी बार जब उन्होंने दावत दी और संयोग से मैं इस बार भी नहीं पहुंच पाया। इसके बाद मेरी उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा तीन बार मैंने दावत दी और हर बार तुम गैर हाज़िर रहे इसलिए अब तुम (हेमंत तिवारी) मुझे अपने घर पर तीन दावतें खिलाओगे। हेमंत तिवारी ने रूंधे गले से कहा जावेद भाई मुझसे दावत खाये बगैर दुनिया से रुखसत हो गए, कुंजी दावतें मेरे ऊपर उधार रह गईं। ये संस्मरण सुनकर उपस्थित पत्रकारों को जावेद काज़िम की ज़िंदादिली और मेहमान नवाजी का एहसास हुआ। हेमंत तिवारी ने आगे कहा अच्छा उस्ताद हो तो शागिर्द को काफी मदद मिलती है। जावेद काज़िम वो जौहरी ठें जिन्होंने कई पत्थरों को तराश कर नायाब हीरा बना दिया। उन्होंने कहा मुझे जावेद भाई के इंतकाल का यकीन नहीं हो पा रहा है।

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इस मौके पर दैनिक नवजीवन से बतौर फोटोग्राफर कैरियर की शुरुआत करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल अज़ीज़ सिद्दीकी ने भी जावेद काज़िम से जुड़े संस्मरण सुनाए। कहा, हम दोनों ने 14 साल तक साथ काम किया। जावेद भाई रिपोर्टिंग की नस-नस से वाकिफ थे। अज़ीज़ सिद्दीकी ने कहा कि वो ख़बर की तह तक गए बगैर संतुष्ट नहीं होते थे, खबरों की क्वालिटी से समझौता करना उन्होंने सीखा ही नहीं था। एक बार उन्होंने जो लिख दिया, उसमें कांट-छाँट करने की हिम्मत किसी की नहीं होती थी, एडीटर हो चाहे न्यूज़ एडीटर।

मुकुल मिश्रा ने कहा जावेद काजिम को दावते देने का बहुत शौक था। उनके घर पहुंचने पर घर के सदस्य बिछ जाते थे। उन्हें एंटीक वस्तुएं इकट्ठा करने का बहुत शौक था। एंटीक सामानों का उनके यहां समृद्ध खजाना था। जावेद काज़िम हमेशा हंसते रहते थे, हालांकि उनकी आदत थी कि अपना दुख किसी से शेयर नहीं करते थे। वह हमेशा सीनियर का सम्मान और छोटों को प्रोत्साहित करते थे।

शोकसभा में मरहूम पत्रकार के साथ काम कर चुके पत्रकारों सहित राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकार उपस्थित रहे। इनमें मुख्य रूप से अब्दुल अज़ीज़ सिद्दीकी, सिद्धार्थ कलहंस, श्रीधर अग्निहोत्री, अजय श्रीवास्तव, भास्कर दुबे, ज़फर इरशाद, पंकज वर्मा, मुकुल मिश्रा, प्रमोद गोस्वामी, सैयद अख्तर अली, तमन्ना फरीदी, संजय धीमान, आलोक त्रिपाठी, दिनेश शर्मा, श्याम बाबू, सुरेश यादव, राजीव बाजपेई, प्रभप्रीत सिंह, दिलीप सिंह, भारत सिंह, शशिनाथ दुबे, संजोग वाल्टर, अतीकुर्रहमान सिद्दीकी सहित कई वरिष्ठ पत्रकार उपस्थित रहे।

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