सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों की भरमार है। इनका उद्देश्य साधारण हंसी-मजाक करने से लेकर बड़ी हिंसा फैलाने तक कुछ भी हो सकता है। सोशल में मीडिया में अब आने वाले कई मैसेज केवल सरकार के लिए ही नहीं बल्कि आम लोगों के लिए भी बड़ी मुसीबत साबित हो रहे हैं। कई मैसेज राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा हैं। यही वजह है कि 24 सितम्बर 19 एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को तीन सप्ताह के भीतर सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट को नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं। सोशल मीडिया के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद सरकार को कुछ करना ही होगा कि आखिर वह कोई दिशा-निर्देश लागू क्यों नहीं कर रही है? कहना कठिन है कि भारत सरकार सोशल मीडिया का दुरुपयोग रोकने के लिए क्या और कैसे दिशा-निर्देश तैयार करती है और वे किस हद तक प्रभावी होते हैैं, लेकिन इसमें दोराय नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मनमाना इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों में भी हो रहा है। इसी कारण सोशल मीडिया का दुरुपयोग पूरी दुनिया के लिए एक समस्या बन गया है। सोशल मीडिया का दुरुपयोग केवल ट्र्रोंलग के रूप में ही नहीं हो रहा है। एक बड़ी समस्या यह है कि सोशल मीडिया के माध्यम से वैमनस्य के साथ झूठी खबरें फैलाने का काम भी किया जा रहा है। कई बार तो यह काम सुनियोजित तरीके से किया जाता है और इसी क्रम में जनमत को भी प्रभावित करने की कोशिश की जाती है। इस सिलसिले में कैंब्रिज एनालिटिका नामक कंपनी पर लगे इस सनसनीखेज आरोप की अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसने फेसबुक का डाटा चोरी कर अमेरिकी चुनावों को प्रभावित करने का काम किया।निरूसंदेह उन घटनाओं की अनदेखी नहीं की जा सकती जो वाट्सएप के जरिये फैलाई गई अफवाहों के नतीजे में घटीं। ऐसी कई घटनाएं भारत में भी घटीं। इन घटनाओं के बाद वाट्सएप ने फर्जी खबरों पर लगाम लगाने के कुछ उपाय अवश्य किए, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि सोशल मीडिया के जरिये कि फर्जी खबरें फैलाने का काम बंद हो चुका है। अगर ऐसा नहीं हुआ है तो इसकी एक वजह यह है कि सोशल मीडिया के सभी प्लेटफार्म ट्र्रोंलग और फर्जी खबरों को रोकने के लिए प्रभावी उपाय नहीं कर सके हैैं।

बेहतर हो कि सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफार्म का गलत इस्तेमाल रोकने के लिए सरकारों का सहयोग करें। उनके सहयोग से ही सरकार ऐसे दिशा-निर्देश बना सकती है जो सोशल मीडिया के दुरुपयोग रोकने में प्रभावी सिद्ध हों। ऐसे दिशा-निर्देश चाहे जब बनें, यह आवश्यक है कि सोशल मीडिया में सक्रिय लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की महत्ता और साथ ही उसकी गरिमा को भी समझें।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह मतलब नहीं हो सकता कि जिसके मन में जो आए वह कहे। यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल जिम्मेदारी के साथ नहीं किया जाएगा तो उपयोगी माना जाने वाला सोशल मीडिया बदनामी का शिकार होकर अपनी महत्ता खो सकता है। ऐसा न हो, इसके लिए सभी को सजग-सक्रिय होकर इसके लिए अतिरिक्त कोशिश करनी चाहिए कि सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म संवाद का उपयोगी मंच बनें। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह उसे सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर रोक संबंधी दिशा-निर्देश बनाने की समय-सीमा बताए. पीटीआई के मुताबिक अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर संदेश या कोई अन्य सामग्री डालने वाले का पता लगाना एक गंभीर मुद्दा है और इसके लिए नीति की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना था कि तकनीक खासकर सोशल मीडिया का दुरुपयोग खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है और अब सरकार को इसमें दखल देना ही चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इस मुद्दे पर फैसला लेने में सक्षम नहीं है और सरकार ही है जो इस पर दिशा-निर्देश ला सकती है।ज्ञात होगा कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने आधार को सोशल मीडिया प्रोफाइल से लिंक करने संबंधी मामले में केंद्र सरकार से जवाब मांगा था. शीर्ष अदालत ने पूछा था कि क्या सोशल मीडिया अकाउंट्स को रेग्युलेट करने के लिए उन्हें आधार से जोड़ने की सरकार की कोई योजना है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में जल्द फैसला लिए जाने की जरूरत है।

यह पूरा मामला तब शुरू हुआ जब तमिलनाडु सरकार ने सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार से लिंक कराने संबंधी पहल की. उसका तर्क है कि ऐसा होने से सोशल मीडिया के जरिए राष्ट्रविरोधी और आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने वालों पर नकेल कसी जा सकेगी. राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा है कि ऐसा करने के बाद फेक न्यूज, आपत्तिजनक और पोर्नोग्राफिक कंटेंट पोस्ट करने वालों की पहचान भी संभव हो पाएगी. तमिलनाडु सरकार की इस पहल पर फेसबुक को एतराज है. उसका कहना है कि आधार को सोशल मीडिया अकाउंट से लिंक करने पर यूजर्स की प्राइवेसी खत्म हो जाएगी जो प्राइवेसी नियमों का उल्लंघन होगा। वैसे तो सोशल मीडिया दूर दराज बैठे अपने परिजनों, मित्रों से जुड़े रहने का प्रभावी और शानदार माध्यम है। भले ही यह आभासी दुनिया हो, लेकिन इस पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी मित्र बन जाते हैं, जो एक दूसरे से कभी मिले नहीं होते। खास तौर से यदि विचारधारा समान हो तो यह मित्रता और प्रगाढ़ हो जाती है और लोग समूह बनाकर अपने पक्ष में तर्क-कुतर्क तो करते ही हैं, डाक्टर्ड वीडियो और फोटोशॉप का उपयोग कर फोटो बनाकर भ्रमित करते हैं। अफवाह फैलाते हैं। लोगों को बदनाम करते हैं। कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल मजे लेने के लिए अपनी रचनाधर्मिता का गलत इस्तेमाल कर लोगों को बदनाम करने में विशेष रुचि लेते हैं। अभी कुछ दिन पहले फेसबुक पर खराब खाने का वीडियो वायरल कर चर्चा में आए बीएसएफ के पूर्व जवान तेजबहादुर यादव के लिए किया गया था। नक्सली आपरेशन में मारे गए एक जवान की फोटो डालकर बताया गया कि तेजबहादुर की हत्या कर दी गई। अब डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत रामरहीम के जेल जाने के बाद सोशल मीडिया पर यह अफवाह तेजी से फैलाई जा रही है कि जेल में बंद गुरमीत नकली है। ऐसे कई उदाहरण हैं। सोशल मीडिया का सबसे भयावह दुरुपयोग सांप्रदायिक हिंसा और दंगे फैलाने में भी होता है। डेराप्रमुख प्रकरण के पहले हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान जो हिंसा हुई उसमें भी सोशल मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया गया।

वैसे भी आत्महत्या के लाइव वीडियो और हिंसा के वीडियो डालने की लोगों में होड़ लगी रहती है। इस वजह से सोशल मीडिया से सतर्क रहने की जरूरत है। यही नही देश में केन्द्र और राज्य सरकार के अधीन करोड़ों की संख्या में कर्मचारी है ऐसे में सोशल मीडिया में फर्जी तरीके से 33 साल की सेवा पूरी करने पर सेवानिवृत्ति की खबरें फैलाने से उक्त समाज प्रभावित होता है। समुदाय विशेष, धर्म के आधार पर टिप्पणी विवादित पोस्टों से समाज विद्यटन और एक संवर्ग दूसरे संवर्ग को दूश्मन की नजर से देख रहा है। ऐसा नहीं है कि सोशल मीडिया पर सब गलत ही हो रहा है। इसके जरिये बहुत से अच्छे काम भी हो रहे हैं। अच्छे लोग ज्ञानवर्धक जानकारी दे रहे हैं, अच्छी चीजें सामने आ रही हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर जो गलत हो रहा है इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। कैसे लगेगा यह सरकार को तय करना है। एक तरीका यह भी हो सकता है कि सोशल मीडिया पर किसी को एकाउंट बनाने की इजाजत तभी मिले जब वह उसमें अपना आधार नंबर रजिस्टर कराए। फोन नंबर रजिस्टर कराए और संबंधित आधार नंबर एकाउंट बनाने वाले का ही है, इसकी पुष्टि के बाद ही उसे इजाजत मिले। यही नही अपवाह फैलाने, विघटन पैदा करने एवं किसी वर्ग विशेष पर प्रहार करने, किसी के निजी मामलें, चरित्र हनन आदि के दोषी के खिलाफ संख्त कार्रवाई का कानून अब वक्त की जरूरत है। – प्रेम शर्मा