Friday , February 21 2020

ओ मेरे कश्मीरी भाई !

ओ मेरे कश्मीरी भाई
ले ले मेरी इन आँखों को
इन्हीं आँखों ने देखे थे
तुम्हारे चाँदी के पहाड़
वो दूध की नदियाँ
वो फूलों से ख़ूबसूरत चेहरे
वो केसर के महकते खेत
वो डल झील पर तैरते सपनों के घर !

ये कल की नहीं
जैसे अभी की बात है
वो सोनमर्ग की पहाड़ी पगडंडी
वो घोड़े को सचेत करती
तुम्हारी होश होश की घंटी
वो बारिश की झड़ी
ठंड से काँपती मेरी देह
और तुम्हारे हाथों ने
मुझे पहना दिया था
उतार कर अपना फिरन
मेरे मना करने पर भी तुम नहीं माने
तुमने कहा था
तुम्हें तो आदत है !
आज भी नहीं उतार पाई तुम्हारी उस फिरन को
नहीं उतार पाती, कभी नहीं उतार पाऊँगी !

ओ मेरे भाई
ले लो मेरी इन आँखों की रोशनी
गोलियों से छलनी कर दो मेरा चेहरा, मेरा पूरा शरीर !
ओह तुम्हारी वो बेबसी
“हमारी ये जन्नत बहुत बदनाम हो गयी
हम पर दाग लग गया !”

ओ मेरे कश्मीरी भाई !
छीन ले मेरी भी रोशनाई !
तुम्हारी जन्नत का ये दाग-दाग चेहरा
यह लहूलुहान चेहरा !
नहीं देखा जाता मुझसे !

Post Source : Arun Maheshwari

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