Friday , February 21 2020

बैठे हैं हम तो कब से इसी इन्तज़ार में

बैठे हैं हम तो कब से इसी इन्तज़ार में
कब आमद ए बहार हाे उजड़े दयार में

अब्द ए ख़ुदा जो अस्ल में अब्द ए ख़ुदा बने
वुसअत बुहत है रहमते परवर दिगार में

जिस दिन से उसने तल्ख़ मिज़ाजी से बात की
है इक अजब चुभन सी दिल ए बे क़रार में

गरदिश न मुस्कुरा तू मेरे ख़स्ता हाल पर
आगाह कर रहा हूँ तुझे बार बार में

मुझको तेरे लबों का तबस्सुम अज़ीज़ है
आता है जीत का युँ मज़ा मुझको हार में

आज़ाद किस तरह हाे उदासी की क़ैद से
रहता हाे मुबतिला जाे ग़म ए राेज़गार में

कहते थे मरके चैन ताे पाऐंगे कम से कम
याद ए बुताँ तो आती है अब भी मज़ार में

हाेता न बिलयक़ीन तजरबाें का इनकशाफ
धाेका मिला न हाेता अगर बद्र प्यार में

✍️ कलाम बदर हुसैन बद्र स्यानवी

Post Source : Facebook – Badar Husain

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