Tuesday , November 19 2019

मीडिया का चरित्र भी तय करेगा अयोध्या फैसला

मंदिर-मस्जिद विवाद पर फैसला मीडिया का भी इम्तेहान लेगा।

नवेद शिकोह 8090180256 8090180256

ये उद्गार किसी बुद्धिजीवी वर्ग के पेशेवर के नहीं हैं। बाल काटते हुए एक बुजुर्ग हज्जाम याक़ूब का ये ख्याल चौकाने वाला भी था और सुकून भी दे गया। लखनऊ के पुराने लखनऊ में गोलागंज की तंग गलियों में याकूब जैसे बड़े ख्याल के मालिक और भी हैं। लखनऊ की चौक की फूल वाली गली में कमला अम्मा नाम से जाने जाने वाली एक बुजुर्ग महिला का ख्याल भी किसी दानिशवर से भी ज्यादा गहरा नजर आया। हिन्दू-मुस्लिम की मिक्स आबादी के बीच रहने वाली अम्मा को भरोसा है कि मंदिर-मस्जिद पर फैसला कुछ भी आये पर दोनों कौमों के लोगों के रिश्तों में मिठास बर्करार रहेगी। छात्र संजीव भी देश के माहौल को सामान्य मान रहे हैं। उन्हें भी कहीं भी किसी भी फैसले पर तनाव जैसे हालात का कोई भी डर नहीं सता रहा। इस नौजवान को डर है तो बस सोशल मीडिया और मीडिया से। इसी तरह फैशन डिजाइन फरहा भी कुछ ऐसी ही बात कहती हैं- अगर मीडिया ने अपना सही दायित्व निभाया तो फैसले को देश के हर धर्म-समुदाय के लोग कुबूल करेंगे। अमन-शांति और भाईचारा बर्करार रहेगा।

वाकई ये सच भी है कि अयोध्या की पावन धरती पर राम मंदिर-बाबरी मस्जिद के विवाद पर देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला कईयों का इम्तिहान भी लेगा। ऐसे नाजुक मौके पर देश की जनता का रुख तो सकारात्मक नजर आ रहा है। विभिन्न धर्म समुदायों के धार्मिक गुरु भी अपनी जिम्मेदारी का दायित्व बखूबी निभा रहे है। बस अब मीडिया और सोशल मीडिया भी अपना सही कर्तव्य निभा ले तो इंशाअल्लाह सब कुछ ठीक-ठाक रहेगा। आम लोगों से बातचीत में लगा कि लोगों कि निगाहें मीडिया की जिम्मेदारी पर भी हैं।

अयोध्या के पिच पर फाइनल का उत्साह बना हुआ है। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद पर बड़ा फैसला आते ही भारत का कद और भी बड़ा हो जायेगा। विवाद खत्म हो जायेगा। सियासत के बाजार में भावनाएं बेची जाने की सबसे बड़ी दुकान बंद हो जायेगी। हम साबित करेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में न्यायिक फैसले का किस कद्र सम्मान किया जाता है। हम दुनिया को बता देंगे कि धर्मनिरपेक्ष भारत में अखंडता, समरसता, सौहार्द, एकता-भाईचारे और गंगा जमुनी तहजीब को कोई भी ताकत चुनौती नहीं दे सकती। भारतीय समाज का हर तब्क़ा मंदिर-मस्जिद विवाद को खत्म करने वाले एतिहासिक और बहु प्रत्यक्षित का स्वागत करने को तैयार है। एक सप्ताह के दौरान सामने आने वाले इस फैसले को लेकर उत्साह जरूर है लेकिन गर्मागर्मी, गरमाहट या तनाव नहीं है।

लग रहा हैं कि हम बदल गये हैं। सुधर गये हैं। कट्टरता और संकीर्णता की बर्फ पिघल रही है। नये भारत की नयी सोच आशा की किरण दिखा रही है। नये निज़ाम में कट्टरपंथियों की कट्टरटा भी नर्म पड़ गयी है। नफरतों के हौसले पस्त हो गये हैं। फिरकापरस ताकतें दुबक कर कहीं छिप गयीं है। बड़े फैसले की बेला पर लग रहा है कि नये भारत का निजाम लाजवाब हो गया है। इन दिनों शांति और सौहार्द की अपीलों से देश गूंज रहा है।

सात बरस पहले लखनऊ के एक अखबार से रिटायर हो चुके वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष वाजपेई आज की मीडिया के बारे में अच्छी राय नहीं रखते।खासकर वो कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चंद पत्रकार अपनी जिम्मेदारी का सही निर्वाहन नहीं कर रहे हैं। अमन चैन से वो कहते हैं कि आज का अधिकांश भारतीय समाज जियो और जीने दो के सिद्धांत पर अमल कर रहा हैं। रही बात भारत विरोधी आतंकी ताकतों की, तो इनसे हमारी कुशल सरकार निपट लेगी। लेकिन डर बस एक ही बात का है। हमें लश्करे तैयबा से नहीं बल्कि ‘लश्करे नोएडा’ से डर लगता हैं। इनसे ही हमें सावधान रहना हैं। नफरत फैलाने और माहौल खराब करने के लिए ये आमादा हैं।

लगता है कि सौहार्द बिगाड़ने की इन्होंने सुपारी ली है। बढ़ते न्यूज़ चैनलों ने पत्रकारिता को सबसे बुरे दौर पर ला कर खड़ा कर दिया है। जमीनी रिपोर्टिंग का स्थान टीवी डिबेट ने ली लिया है। हिंदू-मुस्लिम के अखाड़ानुमा डिबेट का संचालन एक एंकर करता है। जो एंकर/पत्रकार सबसे ज्यादा नफरत फैलाने में माहिर साबित होता है टेलीविजन के बाजार में वो सबसे बड़ा ब्रांड बन जाता है। टीवी पैनल पर मजहबी नफरत और तू-तुकार करके भारतीय समाज के बीच फासले पैदा करने की साजिशें नई नहीं है। लेकिन आज जब अयोध्या मसले पर फैसला आने को लेकर शांति और सौहार्द की अपीलें की जा रही हैं तो ऐसे में कुछ टीवी चैनलों से भी सावधान रहने की जरूरत है।

Source : Naved Shikoh Facebook

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