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कन्हैया की ‘जन गण मन यात्रा’ क्यों महत्वपूर्ण है?

जो लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को पसन्द नहीं करते, वे भी इस बात की तारीफ करते दिखे कि केजरीवाल ने दिल्ली का चुनाव जनता के असल मुद्दों पर लड़ा और बीजेपी की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों को धूल चटा दी।

जो लोग कम्युनिस्टों को पसंद नहीं करते, वे भी यह बात मानते हैं कि केरल और त्रिपुरा दो सर्वाधिक शिक्षित प्रदेश हैं और इसमें कम्युनिस्टों का अहम योगदान है।

जो लोग मनमोहन सिंह या कांग्रेस को पसंद नहीं करते, वे भी आरटीआई, शिक्षा का अधिकार, भोजन का अधिकार, मनरेगा जैसी चीज़ों की तारीफ करते हैं।

जो लोग नरेंद्र मोदी के विरोधी हैं, वे भी उनकी कुछ जनहित की योजनाओं को अच्छा बताते हैं।

इन चार उदाहरण से आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जो नीति जनता के हित में है, जो सवाल जनता से सीधा जुड़ा है, वह मुद्दा पार्टी और नेता से ऊपर है और सबको स्वीकार है।

इसी लिहाज से बिहार में कन्हैया कुमार की जन गण मन यात्रा काफी अहम है। वे 30 जनवरी को भितिहरवा से यह यात्रा लेकर निकले हैं और हर दिन तकरीबन एक जिले में रैली संबोधित कर रहे हैं और विभिन्न मुद्दों पर जनता से बात कर रहे हैं। यह रैली प्रमुख रूप से सीएए-एनआरसी के विरोध में है, लेकिन इस पूरी यात्रा में कन्हैया जो जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे बिहार की राजनीति की दशा दिशा बदल सकते हैं।

सीएए-एनआरसी के अलावा कन्हैया हर अहम मुद्दे पर जनता को संबोधित कर रहे हैं। इस यात्रा के दौरान उनके लगभग भाषण सुनने पर पता चलता है कि उनके प्रमुख मुद्दे हैं- शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, रोटी, कपड़ा, मकान, किसान, जवान, युवा, बेरोजगारी, नौकरी, पेंशन, निजीकरण, सामाजिक सौहार्द, साम्प्रदायिकता, भेदभाव, कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम, पुलिसिया अत्याचार, समान काम का समान वेतन, अवसर की समानता, सरकारी लूट, धर्म का धंधा आदि-इत्यादि।

बिहार जैसे बीमारू राज्य को अब इससे आगे जाने की जरूरत है कि 1995 में वहां अपराध बहुत था, नीतीश जी ने बंद कर दिया. अपराध खत्म तो उससे आगे क्या? सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक रूप से तो बिहार के लोग तो अब भी उसी हालत में जिस हालत में पहले थे!

नागरिकता कानून को लेकर जनता में काफी भ्रम फैलाया गया हैै। भ्रमित जनता को यह बताने की जरूरत है कि विवाद क्या है। कन्हैया यह काम बखूबी कर रहे हैं।

अगर कोई व्यक्ति किसी पार्टी लाइन के मुताबिक नहीं बोल रहा है तो इस बात में कोई दुविधा नहीं है कि नया नागरिकता कानून आरएसएस का नया राममंदिर है। भारत में नागरिकता को लेकर कोई अस्पष्टता, विवाद या शरणार्थियों को नागरिकता देने को लेकर कोई संकट नहीं था। यह पूरा विवाद नागरिकता की आड़ में धार्मिक विभाजन की कोशिशों से उपजा है।

मैं पूरे भारत में एक भी व्यक्ति को नहीं जानता जो किसी देश से भागकर आए किसी पीड़ित को नागरिकता देने के विरोध में हो।

सरकार की ओर से यह जो मकड़जाल फैलाया गया है, कन्हैया आम जनता की भाषा में उन्हें समझा रहे हैं। आम जन जीवन को लेकर जो समस्याएं जनता के सामने हैं, कन्हैया उनका उदाहरण देकर लोगों को समझा रहे हैं कि इनसे आपका ध्यान हटाने के लिए आपको उल्लू बनाया जा रहा है। स्थानीय समस्याओं के उदाहरण से जनता भी इन बातों को बेहतर तरीके से समझ रही है।

इससे कन्हैया या उनकी पार्टी को राजनीतिक लाभ होगा कि नहीं, यह प्रश्न गौण है। अहम बात है कि इस यात्रा के बहाने युवाओं में जागरूकता बढ़ेगी। जनता अपनी भाषा में नागरिकता कानून का पक्ष विपक्ष समझ रही है।

कन्हैया का राजनीतिक भविष्य चाहे जो हो, लेकिन अभी वे जो कर रहे हैं, वह देश के सभी विपक्षी नेताओं के लिए सबक है। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव आदि युवा नेताओं को इससे सीखना चाहिए।

मीडिया में ऐसी भी रिपोर्ट हैं कि कन्हैया की इस यात्रा में भारी भीड़ जुट रही है और इससे उनकी विरोधी पार्टियों में काफी बेचैनी है। अगर कन्हैया बिहार चुनाव से पहले बिहार की राजनीति को जनता के असल मुद्दों के इर्दगिर्द लाने में कामयाब हो जाते हैं तो यही उनकी सफलता मानी जाएगी।

युवा नेतृत्व अगर जनता के हित के साथ जनता के बीच पहुंचता है, तो सूरत हर हाल में बदलेगी और चुनाव हारे हुए कन्हैया की यह बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।Krishna Kant

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