Thursday , April 9 2020

हम लेके रहेंगे आज़ादी

शबाहत हुसैन विजेता

आज़ादी वाला नारा कन्हैया का दिया नारा नहीं है। तीन दशक पहले भी यह नारा देश में गूंजता सुनाई देता था। रवि नागर संगीत में पिरोकर जब आज़ादी का नारा लगाते थे तो पूरा प्रेक्षागृह उन्हीं के साथ गा उठता था। संगीत के साथ जब लोगों की तालियां संगत करती थीं तो माहौल देखने के लायक होता था लेकिन आज़ादी का यह नारा कन्हैया के जरिये जेएनयू होता हुआ लोगों के बीच लौटा तो पहले से कई गुना लोकप्रिय होकर लौटा। इसकी लोकप्रियता बढ़ी तो इस मनभावन नारे के दुश्मन भी तैयार हो गए।

आज़ादी का नारा तो धमनियों में जम रहे खून की रवानी को बढ़ाने के लिये है। आज़ादी का नारा तो ऊर्जा का संचार करने के लिए है। यह नारा तो रिश्तों को जोड़ने के लिए है। यह नारा तो नफरतों को मोड़ने के लिए है। आज़ादी का लफ्ज़ ही हालात में वह ताक़त भर देता है जो किसी भी ताक़त से टकरा जाने की हिम्मत दे जाता है। जब कोई पूरी शिद्दत से चिल्लाता है कि हम लेके रहेंगे आज़ादी तब गुलामी का पिंजरा तैयार करने वाला भीतर से कांप उठता है।

वक़्त करवट बदलता है तो बहुत सारी चीजें बदल जाती हैं। आज़ादी जैसा खूबसूरत लफ्ज़ भी सत्ता और विपक्ष के लिए दो मायनों वाला बन जाता है। लोकतंत्र बेइंसाफी के खिलाफ आवाज़ उठाने का अधिकार देता है तो सत्ता का नशा उस आवाज़ का गला घोंटने के लिए अपनी असीमित ताकत का इस्तेमाल करने लगता है। पुलिस दमन पर आमादा हो जाती है। लाठी की ज़द में औरत है कि मर्द उसे फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। पुलिस के बड़े अधिकारी की भाषा भी सिपाही वाले अंदाज़ में सामने आने लगती है।

सत्ता जब अवाम की ज़बान में अपने लफ्ज़ पहुंचाने के लिए ताक़त का इस्तेमाल करने लगती है तो माहौल खराब होने में देर नहीं लगती है। इंसान जब मज़हब की डोर से इस अंदाज में बंध जाता है कि अच्छे मज़हब और खराब मज़हब की तर्ज़ पर उसकी समीक्षा करने लगता है तब रिश्तों में खटास की शुरुआत होती है। तब मोहब्बत पर नफरत हावी होने लगती है। इंसान को मज़हब के हवाले से पहचाना जाने लगता है। हालात इस हद तक बदतर होने लगते हैं कि सत्ता देश से बड़ी हो जाती है। सत्ता के खिलाफ बोलना राष्ट्रद्रोह बन जाता है। तब सत्ता राष्ट्रवादी और विपक्ष राष्ट्रद्रोही बन जाता है।

हालात ने देश को उसी दोराहे पर ला पटका है। अब सत्ता के हर गलत-सही के साथ खड़े लोग राष्ट्रवादी और सरकारी नीतियों के खिलाफ खड़े लोग राष्ट्रद्रोही बन चुके हैं। अब आज़ादी का नारा लगाने पर सत्ता की तरफ से सवाल उठने लगे हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सत्ता विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने पर आमादा है। अब सत्ता विपक्ष पर सवाल उठा रही है। विपक्ष को कुचल डालने पर आमादा है। सदन को विपक्ष मुक्त करने के बाद अब सड़क को भी विपक्ष मुक्त करने पर आमादा है। अब सरकार के खिलाफ आवाज़ उठाना राष्ट्रद्रोह हो गया है।

हद तो यह है कि सत्ता के साथ खड़े लोगों को हिन्दू और सत्ता के खिलाफ खड़े लोगों को मुसलमान साबित करने की होड़ लगी है। आंदोलनों को कुचला जा रहा है। सरकार के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़ को खामोश किया जा रहा है। युवा वर्ग के दिमाग में इस हद तक ज़हर भरा जा रहा है कि वह कलम फेंककर हथियार उठाने लगे हैं। सरकार की तरफ से वह आंदोलनों को जवाब देने निकल पड़े हैं। अवाम से अवाम को लड़ाने के मोड़ पर देश पहुंच चुका है। हम लेके रहेंगे आज़ादी का नारा लगाने वाले छात्रों पर एक छात्र ही यह कहते हुए फायर झोंक रहा है कि यह लो आज़ादी।

युवा दिमागों में ज़हर एक दिन में नहीं भरा है। इसकी बाकायदा तैयारी की गई है। इसके लिए आईटी सेल चलाये गए हैं। इस आईटी सेल में वेतनभोगी कर्मचारी रखकर ज़हर का प्रसार किया गया है। अच्छे और नामचीन पत्रकारों को खरीदकर उनकी कलम से मज़हबी उन्माद का लावा बिखेरा गया है।

आज़ाद हिन्दुस्तान को गुलामी से बदतर हालात में पहुंचाया गया है। नौकरियां छीनी जा रही हैं, बड़े सरकारी उपक्रम बेचे जा रहे हैं। फसलें बर्बादी की राह पर ले जाई जा रही हैं। हर तरफ आंसुओं के समंदर तैयार किये जा रहे हैं और बर्बाद हिन्दुस्तान की इस तस्वीर पर मज़हबी उन्माद की चादर इस सलीके से बिछाई जा रही है कि ज़ख्मी हिन्दुस्तान से जो खून रिसे वह देखने वालों को राष्ट्रदोहियों की करतूत नज़र आये।

आज़ाद हिन्दुस्तान में नफरत की फसल बोने के लिए प्रशासनिक अधिकारी भी लगाए गए हैं। पत्रकारों की एक फौज भी इसी काम में तल्लीन है। हर न्यूज चैनल पर पिद्दी सा देश पाकिस्तान गूंज रहा है। विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर देश बर्बादी की राह पर बढ़ चला है.

आज़ादी का नारा तब बहुत मायने वाला नारा बन जाता है जब वोट देकर सरकार बनाने वाले मालिक से नौकर ही मालिक होने का सबूत मांगने लगे। डेमोक्रेसी ने सियासत को हर पांच साल में अपने काम का एग्जाम देने का इंतजाम इसीलिए किया था ताकि डेमोक्रेसी में सियासत निरंकुश न होने पाए लेकिन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के जरिये सियासत ने खुद को उस मुकाम पर खड़ा कर दिया है जहां से वह अवाम को मुंह चिढ़ाने लगी है।

हिन्दुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी युवा शक्ति वाला देश है। युवा शक्ति की ऊर्जा के सही इस्तेमाल से देश दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर सकता है लेकिन वही युवा शक्ति अब रिवाल्वर लेकर आज़ादी देने निकल चुकी है। सड़क के एक किनारे पर सरकारी फैसलों के खिलाफ शोर है तो दूसरे किनारे पर उस शोर को खामोश कराने की कोशिश में नाजायज़ असलहे हैं। अपने फैसलों के खिलाफ उठ रहे शोर से खुद को बेपरवाह दिखाने की कोशिश में सरकार लगी है।

वास्तव में समीक्षा का यही वक़्त है। यह तय होना चाहिए कि चुनाव के बाद सरकार सबकी होती है या फिर किसी खास पार्टी और खास विचारधारा की। यह तय होना चाहिए कि देश में विपक्ष की क्या भूमिका होनी चाहिए। यह तय होना चाहिए कि चुनाव के बाद पांच साल तक क्या सरकार को मनमर्जी की छूट मिलनी चाहिए। यह तय होना चाहिए कि सड़क पर गोलियां चलाती युवा शक्ति के दिमाग में ज़हर भरने वालों पर केस चलना चाहिए या नहीं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गोपाल और कपिल का गुनाह उतना बड़ा गुनाह नहीं है जितना कि केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का। गोपाल और कपिल पर अगर धारा 307 का मुकदमा चलता है तो अनुराग ठाकुर पर भी 120 बी का मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

डेमोक्रेसी ने सत्ता की उम्र पांच साल मुकर्रर की है। जनता किसी भी हाल में रहे लेकिन मालिक वही है। पांच साल तक सरकार कितने ही प्रमाणपत्र मांग ले लेकिन पांच साल बाद यही जनता तय करेगी कि देश किसके हाथों में सुरक्षित रहेगा।

देश जब विदेशियों के हाथ में था तब भी इंसाफ की जंग लड़ने वाले गोलियों से नहीं डरे थे। आज भी डरने को तैयार नहीं हैं। बिस्मिल और अशफ़ाक़ को कभी अलग नहीं किया जा सकता। गांधी और मौलाना आज़ाद को भी दूर नहीं किया जा सकता। आंदोलनकारी सरहदी गांधी की तरह अपनी आखरी सांस तक मुल्क की बेहतरी का ख्वाब देखते हुए अपना दम तोड़ सकता है लेकिन आज़ादी का नारा न तब छीना जा सका था न अब छीना जा सकेगा। तुम चाहे जितना ज़ोर लगा लो, हम लेके रहेंगे आज़ादी।

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