Tuesday , December 18 2018

जब सेंसर बोर्ड को हुई वहीदा रहमान की लाल आंखों से आपत्ति

 बॉलिवुड अभिनेत्री वहीदा रहमान ने एक पब्लिक इवेंट में गुरुदत्त के निर्देशन में बनी फिल्म ‘चौदहवीं का चांद’ से जुड़ी कुछ पुरानी यादों को शेयर की है। उन्होंने बताया कि फिल्म के टाइटल गाने में उनकी लाल आंखों को देखकर सेंसर बोर्ड ने कड़ी आपत्ति जताई थी और फिल्म के निर्देशक गुरुदत्त को सीन काटने के लिए कहा था।

वहीदा बताती हैं, ‘जब ‘चौदहवीं का चांद’ फिल्म बन रही थी तब रंगीन सिनेमा नया-नया आया था लेकिन हमारी फिल्म ब्लैक ऐंड वाइट में बनी थी। जब हमारी फिल्म बहुत कामयाब हो गई तो फिल्म की टीम ने सोचा की सिर्फ फिल्म के टाइटल गाने ‘चौदहवीं का चांद’ जो बहुत मशहूर हुआ था, उसको रंगीन में फिर से शूट कर के रिलीज़ किया जाएगा तो दर्शक दोबारा देखेंगे। जब गाना दोबारा कलर में फिल्माया जा रहा था तो उन दिनों लाइट बड़ी तेज हुआ करती थी, लाइट की गर्मी से आंखे जलने लगती थीं, इसलिए मुझे हर शॉट के पहले आंखो में बर्फ लगाना पड़ता था। बार-बार बर्फ लगाने की वजह से मेरी आंखे लाल हो गई थीं। गाना शूट हुआ और सेंसर बोर्ड में गया।’

वहीदा आगे बताती हैं, ‘गाना देखकर सेंसर बोर्ड ने कहा कि गाने में वहीदा के दो सीन काट दीजिए। गुरुदत्त ने सवाल किया कि क्यों काट दें, सीन में तो वहीदा अकेली हैं, फिर परेशानी या खराबी क्या है? गुरुदत्त ने कहा कि उन्होंने गाने को हु-ब-हु ब्लैक ऐंड वाइट के सीन की तरह ही शूट किया है, कुछ नया नहीं जोड़ा गया है। जवाब में बोर्ड ने कहा कि दरअसल इन दो सीन में वहीदा की आंखे बहुत लाल हैं। गुरुदत्त ने आंखे लाल होने का किस्सा बताया। तब भी बोर्ड के लोग नहीं मानें। बोर्ड का कहना था कि लाल आंखों में देखने से लगता है कि यह बहुत सेक्सी सीन है। गुरुदत्त ने बहस की और समझाया कि यह तो पति-पत्नी का सीन है, साथ में पति है तो क्या बुराई है? बोर्ड नहीं माना और बार-बार वह सीन काटने को कहते रहे। काफी बातचीत के बाद तय हुआ कि दो सीन की जगह एक सीन काट दिया जाए। कभी-कभी सोचती हूं कि आज के जमाने में यदि सेंसर बोर्ड के वही मेंबर होते तो वह आजकल की फिल्में देखकर बेहोश हो जाएंगे।’

वहीदा रहमान की एक फिल्म ‘सॉन्ग ऑफ स्कॉरपिअंस’ रिलीज़ के लिए तैयार है। फिल्म के बारे में वहीदा बताती हैं, ‘फिल्म सॉन्ग ऑफ स्कॉरपिअंस’ राजस्थान पर बेस्ड है। ‘फिल्म में मेरी एक नवासी है, मुझे वह नानी बुलाती है। एक मुसलमान परिवार की कहानी है। मेरे किरदार यानी नानी के पास एक हुनर है, जिससे वह दुआ पढ़कर बिच्छू के डंक का जहर उतार देती हैं। नानी चाहती है कि उसकी नवासी इस हुनर को सीखे, लेकिन नवासी इन सब चीजों को तवज्जो नहीं देती है। नानी उसे हमेशा कहती है कि एक दिन जब मैं चली जाऊंगी तो तुम बहुत पछताओगी इसलिए यह हुनर सीख लो। खेल-कूद में बिजी नवासी को नानी एक दिन समझाती है कि तुम चांदनी में बाहर जाओ और ठंड में बाहर निकलो तो मजबूत बनोगी, लेकिन नवासी कुछ सुनने को तैयार नहीं है। ऐसे में नानी सोचती है, जब तक मैं इसे अकेला नहीं छोडूंगी वह मजबूत नहीं बनेगी। इसलिए एक दिन नानी अचानक नवासी को छोड़कर गायब हो जाती हैं। फिल्म में यह नहीं साफ किया गया है कि नानी कहां गईं, वह जिन्दा भी है कि मर गईं।’

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