Tuesday , December 18 2018

विपक्ष के पास भविष्य की कोई राजनीति रणनीति नहीं है

यूपी से 10वां सदस्य कौन, पूंजीपति-खांटी राजनीतिज्ञ ! 
इस शीर्षक से (24 फरवरी को मैंने अपनी पोस्ट में लिखा था कि विपक्ष सिर्फ एक ही व्यक्ति को राज्यसभा भेज पाएगा)

…..अब सपा के राज्यसभा सदस्य नरेश अग्रवाल व उनके विधायक पुत्र नितिन अग्रवाल के भाजपा में जाने से विपक्ष के दूसरे प्रत्याशी की जीत मुश्किल हो गई? यह भी साफ हो गया है कि विपक्ष मुस्लिम वोटों व सत्ता की चाबी के लिए भले एक मंच पर आ गया हो मगर उसके पास भविष्य की कोई राजनीति रणनीति नहीं है। यही कारण है कि वह राज्यसभा सीटों के समीकरण साधने में चूक गया ? राज्यसभा की 10 रिक्त सीटों के लिए 13 लोगों ने पर्चे भरे हैं। भाजपा की ओर से 11 लोगों ने , एक सपा और एक बसपा की ओर से भरा गया है। सपा के 47 विधायक जीते थे, नितिन के भाजपा को समर्थन के एलान से यह संख्या-46 हो गयी है। सूत्रों पर भरोसा करें तो आठ और एेसे विधायक हैं जो दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर उठकर आत्मा की आवाज पर भाजपा समर्थित प्रत्याशी को वोट दे सकते हैं। अगर ऐसा हुआ तो रिजल्ट क्या होगा ? समझा जा सकता है। 1 सीट के लिए तकरीबन 37 vote की जरूरत है। क्रॉस वोटिंग की आशंका से भी इंकार नही किया जा सकता है। अब देखना होगा कि ऊंठ किस करवट बैठता है। अगर नंबर गेम में विपक्ष हारा तो इसे किसकी हार मानी जायेगी ,? सबसे बड़े घटक दल सपा की, bsp या Congress की हार माना जायेगा ???? आप राय रख सकते हैं। हा कुछ लोग कह सकतें है कि राज्यसभा चुनावों में एजेंट को वोट दिखाना होता है? मगर अनिवार्यता नहीं है । यह भी याद रखिये 5 मई 2018 कोें विधान परिषद की 13 सीट खाली हो जायेगी। यानी राज्यसभा के चुनाव मे मदद का पुरस्कार मिलने की 2 माह में ही उम्मीद दिख रही है। और अब सपा के रणनीतिकार रामगोपाल यादव ने फ़िरोज़ाबाद के हरीओम यादव पर bjp से मिल जाने का आरोप लगा दिया है_ करोड़ों लेने का आरोप खुले मंच से लगाया है। यह वही हरिओम है जो रामगोपाल के बेटे को चुनाव जिताने के लिए ढेरों लोगों से दुश्मनी कर बैठा था। इतिहास बताता है कि रामगोपाल यादव की नाराजगी मोल लेकर कोई सपा में रह नही सकता । अगर रह गया तो फिर कुछ बन नही सकता। नज़ीर कई हैं। शिवपाल यादव , राजेश dixit,सरोजनी अग्रवाल जैसे लीग भी उनके कोप के शिकार रहे हैं। इनमें से राजेश dixit को तो सपा में उनकी परछांई कहा जाता था। मगर एक बार रामगोपाल ने उनसे दूरी बनाई तो कार्यकर्ता को इशारा मिला कि दल मे रहना है तो dixit से दूरी बनाओ। यही नही सितंबर 2016 से अब तक का परिदृश्य देखे तो पाएँगे की सपा में जो भी उलट_ पलट हुआ उसमें प्रोफेसर रामगोपाल की भूमिका अहम रही। ऐसे मे सिरसागंज का विधायक कोई फ़ैसला ले ले तो फिर चौकना कैसा ???? और पीछे का अतीत देखें तो पांएगे राजबब्बर { तब वह सपा में थ }, अमर सिंह, आजम खां भी उनके कोप का शिकार रहे हैं।

………….

मेरे वरिष्ठ साथी राजबहादुर जी ने यह भी लिखा_पढ़िए गंभीर राजनीतिक टिप्पणी

नरेश अग्रवाल आखिरकार भाजपा में आ गए और उनके आने पर भाजपा में भी लोगों का नाक भौं सिकोड़ना अपेक्षित भी था। वैश्य समाज से होने के कारण नरेश का स्वाभाविक ठिकाना भाजपा ही थी लेकिन दो कारणों से अब तक ऐसा नहीं हो पाया था। कारोबारी होने के कारण नरेश को सूबाई सरकार की हिमायत दरकार रहती है और बीतें डेढ़ दसक से भाजपा सूबे की सत्ता से बाहर थी इसलिए भाजपा में जाना उनकी प्राथमिकता नहीं थी। दूसरी वजह भाजपा के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह द्वारा उन्हें न पसंद किया जाना और यह नहीं भूलना चाहिए कि इस दौरान राजनाथ दो बार बीजेपी के प्रेजिडेंट रहे। नरेश वैश्य समाज से अवश्य आते हैं लेकिन आक्रामक राजनीति उनका स्टाइल है। गच्चा खाने से पहले या खाने के बाद गच्चा देने में देर नहीं करते। नरेश कोई गोपाल कृष्ण गोखले जैसे सिद्धान्तनिष्ठ राजनीतिज्ञ नहीं है इसलिए उनसे गैर-मतलबपरस्ती की राजनीति की उम्मीद करना खुद से बेमानी और नादानी होगी। उनकी राजनीति की शैली वैसी ही व्यावसायिक दृष्टिकोण वाली है जैसी नौकरी बदलने की होती है। जहां लाभ दिखे वहां जाओ। और जो लोग बीते बयानों का हवाला दे रहे हैं उनका दुख और क्षोभ अपनी जगह और यह हकीकत अपनी जगह है कि राजनीति आगे देखने का नाम है न कि अतीत की लकीरें पीटने का नाम। बहुत बड़े बड़े नेता ऐसा करते रहे हैं तो नरेश की बिसात ही क्या। सीधी सी बात है जहां रहोगे वहीं के भजन गाना होगा नौकरी हो या सियासत। पूरे मामले में नादान और नौसिखिया साबित हुए अखिलेश यादव। कुछ महीने पहले नरेश की विवादित टिप्पणी करने पर अखिलेश ने उन्हें बाहर कर दिया होता तो वह अपने विरोधियों से भी प्रसंशा प्राप्त करते। नरेश ने तो बाप के खिलाफ बेटे का साथ दिया था तो बेटे से बदले में उम्मीद करना तो बनता ही था। बहरहाल अब नरेश को सियासत में बेटे को स्थापित करने और कारोबार के संचालन के साथ साथ सरकारी ब्लैक और खाकी सिक्योरिटी भी सुगमता से हासिल हो सकेगी। और यह भी तय है कि जब तक सूबे में भाजपा सरकार है नरेश का आशियाना बीजेपी ही रहेगी।

Parvez Ahmad  ke facebook page se

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