Wednesday , August 15 2018

मैं स्कूल नही जाऊंगा

मैं स्कूल नही जाऊंगा

रमज़ान का रहमतों भरा महीना
जुमे का दिन मस्जिद पूरी तरह से भरी हुई

एक पाँच छ साल का मासूम सा बच्चा अपनी छोटी बहन को लेकर मस्जिद के एक तरफ कोने में बैठा हाथ उठा कर अल्लाह से न जाने क्या मांग रहा था।

कपड़ों पर मेल लगा हुआ था मगर निहायत साफ, उसके नन्हे नन्हे से गाल आँसूओं से भीग चुके थे।
बहुत लोग उसकी तरफ मुतवज़ो थे और वह बिल्कुल अनजान अपने अल्लाह से बातों में लगा हुआ था।

जैसे ही वह उठा मैंने बढ़ के उसका नन्हा सा हाथ पकड़ा और पूछा-
“क्या मांगा अल्लाह से”?

उसने कहा-
“मेरे पापा मर गए हैं उनके लिए जनंत,
मेरी माँ रोती रहती है उनके लिए सब्र,
मेरी बहन माँ से कपडे सामान मांगती है उसके लिए पैसे”।
“तुम स्कूल जाते हो”?

मैंने सवाल किया।
“हां जाता हूं” उसने कहा।
“किस क्लास में पढ़ते हो ?” अजनबी ने पूछा

“नहीं अंकल पढ़ने नहीं जाता, मां चने बना देती है वह स्कूल के बच्चों को बेचता हूँ, बहुत सारे बच्चे मुझसे चने खरीदते हैं, हमारा यही काम धंधा है” बच्चे का एक एक लफ्ज़ मेरी रूह में उतर रहा था ।

“तुम्हारा कोई रिश्तेदार”?

न चाहते हुए भी मै बच्चे से पूछ बैठा।
“पता नहीं, माँ कहती है गरीब का कोई रिश्तेदार नहीं होता,
माँ झूठ नहीं बोलती,

पर अंकल,
मुझे लगता है मेरी माँ कभी कभी झूठ बोलती है,
जब हम खाना खाते हैं हमें देखती रहती है,
जब कहता हूँ
माँ तुम भी खाओ, तो कहती है मैं ने खा लिया था, उस समय लगता है झूठ बोलती है ”

“बेटा अगर तुम्हारे घर का खर्च मिल जाय तो पढाई करोगे ?”
“बिल्कुलु नहीं”
“क्यों”?

“पढ़ाई करने वाले गरीबों से नफरत करते हैं अंकल,
हमें किसी पढ़े हुए ने कभी नहीं पूछा – पास से गुजर जाते हैं”
अजनबी हैरान भी था और शर्मिंदा भी।

फिर उसने कहा “हर दिन इसी मस्जिद में आता हूँ, कभी किसी ने नहीं पूछा – यहाँ सब आने वाले मेरे वालिद(बाप) को जानते थे – मगर हमें कोई नहीं जानता

“बच्चा जोर-जोर से रोने लगा” अंकल जब बाप मर जाता है तो सब अजनबी क्यों हो जाते हैं ?”
मेरे पास इसका कोई जवाब नही था और ना ही मेरे पास बच्चे के सवाल का जवाब है।
ऐसे कितने मासूम होंगे जो हसरतों से घायल हैं

मैंने अपनी तो सारी ख्वाहिशें अल्लाह के सामने दुआ में रख दी थी
सब कुछ होते हुए भी और चाहिए और चाहिए कि नियत से हमेशा दुआ मांगते हैं हम लोग
इस पल मुझे खुद पर शर्म आ रही थी
आसमान की तरफ देख कर मैं पूछ बैठा
या इलाही इसे नाइंसाफी समझूँ या तेरी कोई तरकीब?

सोच ही रहा था कि बच्चे ने मेरा कुर्ता खींचा और बोला अंकल आप का रोज़ा है?

ये उसका सवाल नही था
अल्लाह की जानिब से मेरे सवाल का जवाब था जो मेने थोड़ी देर पहले उससे पूछा था

उस बच्चे का पेट भूक से खाली था
और मेरा रोज़े से

शायद भरा पेट लेकर में कभी उसकी परेशानी नही समझ पाता

तभी तो उस बच्चे ने बोला था कि हम पर कोई ध्यान नही देता

मै अपने घुटनों पर बैठा और बोला हाँ बेटा मेरा रोज़ा है
आप धूप में मत खड़े होइए
ये बात मुझे अंदर तक झंझोड़ गयी कि कैसे अल्लाह ने इस बच्चे को गरीबी में भी आला अख़लाक़ (शिष्टाचार) दिए हैं
जबकि आज कल कोई सीधे मूहँ बात नही करता

मैंने पूछा बेटा आप का नाम क्या है?
रेहान

रहते कहाँ हो ?
उसने पता बताया

शाम को जितना मुझसे हो सका वो सब लेकर मैं उसके घर के दरवाजे पर खड़ा था
आवाज़ दी रेहान

एक कमज़ोर सी दोशीज़ा (पर्दा नशीन औरत) बाहर आई
सलाम
जी वालेकुम अस सलाम
बताइये

जी रेहान है घर पर
तभी रेहान बाहर आया
अरे अंकल आप
उसकी माँ ने अंदर बुलाया

एक चारपाई पर मुझको बैठाया
खुद नीचे बैठे
मैं उठ कर नीचे बैठ गया
आपने कहा ऐसा क्यों करते हो

मेरे ज़बान से बस यही निकला
जब इंसानियत का मयार (standard) गिर जाता है तब दिल मे छोटे बड़े की इज़्ज़त खत्म हो जाती है
अभी मुझमे इतनी शर्म बाकी है

ये कह कर मैने सामान के पैकेट पास बैठी छोटी बच्ची और रेहान को दिए
माँ ने कहा हम ये नही ले सकते
वो खड़ी हो गयी
मै भी खड़ा हुआ
उनकी आंखों में आंसू थे
ओर मेरा दिल फटने को था
मैंने उनकी तरफ सामान बढ़ाते हुए कहा
बेटा जब कुछ दे तो माँ को मना नही करना चाहिए

इतना सुनकर वो दो कांपते हुए हाथ मेरे सर पर आ गए
ओर बच्चे मुझसे लिपटे थे

मैंने वादा भी किया कि अब आप लोग अकेले नही हो

थोड़ी देर में इफ्तार का वक़्त हुआ
सबने रोज़ा खोला

वहां से चलते वक़्त मेरे दिल मे सुकून था
की शायद आज का रोज़ा मेरा क़ुबूल हो गया ।

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