Wednesday , August 15 2018

POETS

कराची लाहौर औ कश्मीर : अजमल सुल्तानपुरी

मुसलमाँ और हिन्दू की जान कहाँ है मेरा हिन्दुस्तान मैं उस को ढूँढ रहा हूँ मेरे बचपन का हिन्दुस्तान न बंगलादेश न पाकिस्तान मेरी आशा मेरा अरमान वो पूरा पूरा हिन्दुस्तान मैं उस को ढूँढ रहा हूँ वो मेरा बचपन वो स्कूल वो कच्ची सड़कें उड़ती धूल लहकते बाग़ महकते …

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जिंदगी का एक पूरा फलसफा थे सआदत हसन मंटो

मंटो के बिना मुकम्मल नहीं है उर्दू अदब की दुनिया :11 मई सआदत हसन मंटो की जयंती पर विशेष नई दिल्ली, 10 मई (भाषा) बड़े गौर से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते…महज 43 साल की उम्र में 1955 में इस दुनिया को अलविदा कह गए सआदत हसन …

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नौशाद साहब ने भारतीय संगीत को फिल्मी संगीत का हिस्सा बनाया

पुण्यतिथि विशेष: naushad May 05, 2018 नौशाद साहब उन गुणी संगीतकारों में से थे, जिन्होंने भारतीय संगीत को फिल्मी संगीत का हिस्सा बनाया. वे नए संगीतकारों में पाश्चात्य-संगीत की चोरी से खुद को बहुत जख्मी महसूस करते थे. अपने गम का इजहार उन्होंने अपना एक शेर सुना कर यूं किया. …

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सफर में परेशान हुए मुनव्वर राना का रेल मंत्री से सवाल : क्‍या वरिष्ठ नागरिकों को यही सुविधा मिलती है?

मशहूर शायर मुनव्‍वर राणा का स्‍वास्‍थ्‍य कुछ ठीक नहीं है। ट्रेन यात्रा के दौरान उन्‍हें परेशानी का सामना करना पड़ा। दरअसल, मुनव्‍वर एम्‍स में अपना इलाज कराने के लिए दिल्‍ली आ रहे थे। उन्‍होंने गाजीपुर से आने वाली सुहेलदेव ट्रेन के एसी-1 में टिकट लिया था। मुनव्‍वर ने लखनऊ से …

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आज भी कोई शायर ग़ालिब की बराबरी नहीं कर सकता

ज़ीशान खान । रामपुर रामपुर से मिर्ज़ा ग़ालिब का एक खास रिश्ता रहा है। नवाब रामपुर ने मिर्जा गालिब को पेंशन भी जाती है। रामपुर रज़ा लाइब्रेरी ने आज मौलाना इम्तियाज़ अली अर्शी की याद में “वर्तमान काल में गालिब की प्रासंगिकता“ पर एक सिम्पोजियम किया। इस प्रोग्राम में प्रोफेसर …

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राही मासूम रज़ा की कलम ने हमेशा कट्टरता का विरोध किया

राही मासूम रज़ा की कलम ने हमेशा कट्टरता का विरोध किया. उन्होंने अपने देश की उस मिट्टी को दिल में समेटा जिसमें एक दूसरे के लिए प्यार था. उन्होंने सामाजिक कुरीतियों पर अपनी कलम से हमला किया. उनकी एक कविता इस बात की तरफ इशारा करती है वो कहां तक …

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और भी दुख दिखे ज़माने में मोहब्बत के सिवा —

फैज़ अहमद फैज़ फैज़ अहमद फैज़ उर्दू शायरी का एक ऐसा नाम है जिसकी शायरी आज भी मजलूमों के लिए हिम्मत का काम करती है. फैज़ का जन्म 13 फरवरी, 1911 को अविभाजित भारत के सियालकोट (अब पाकिस्तान) में हुआ था. फैज पहले सूफी संतों से प्रभावित थे. 1936 में …

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शायरे इन्कलाब: ‘शब्बीर हसन जोश’ या ‘जोश मलीहाबादी’

काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब, मेरा ना’रा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब कहा जा सकता है कि उन्होंने उर्दू रोमासंवादी शायरी में के नये किस्म की लडाकू शायरी की नींव डाली सिद्ध उर्दू शायर “जोश” मलीहाबादी (Josh Malihabadi) को उनकी क्रांतिकारी नज्मो के कारण अंग्रेजो के जमाने में “शायरे इन्कलाब” की उपाधि दी गयी थी और लोग उन्हें पढ़ते हुए जेल …

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परवीन शाकिर : ये दुख नहीं कि अँधेरों से सुलह की हमने  मलाल ये है कि अब सुबह की तलब भी नहीं 

आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा  उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की भरी बहार में जैसे मकान ढहता है सर …

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