Thursday , July 2 2020

कश्मीरी अपने पर होने वाले ज़ुल्म की आवाज़ उठाये, तो उसे कश्मीरी पण्डितों पर हुए ज़ुल्मों को याद दिलाया जाता है….,

आख़िर कब तक..!

एस.एन.लाल
द टेलीग्राफ (16 सितम्बर 19) में रिर्पोटर सुभाजी राय ने एक कश्मीरी पत्रकार मुतार्ज़ा कश्मीरी के स्टोरी प्रकाशित की, जोकि कश्मीर के 5 सप्ताह पहले के हालात बयान करती है। इन्होंने बताया कि हम थे और किताबे, पड़ोसी से भी बात नहीं कर सकते थे। ऐसी सख़्ती और ऐसा प्रशासन का कन्ट्रोल पहली बार देखा। जब 5 सप्ताह बाद लैंड लाइन खुली हमको आज पता चला प्रो0 गुलशन मजीद साहब की बहन का इन्तेक़ाल इलाज की कमी से हो गया और वह अपनी बहन के जनाज़े में शरीक तक न हो सके…, जबकि अनन्तनाग, श्रीनगर से सिर्फ 50 किमी दूर है, ऐसे बहुत से वाक़यात मुतार्ज़ा ने सुभाजी को बतायें, मुतार्ज़ा के बीवी-बच्चे लन्दन में है, उनसे भी उनकी बात 5 सप्ताह बाद बात हुई। धारा 370 हटना या न हटना ये मुद्दा अपनी जगह है, धारा 370 के हटने से देशवासियों को क्या लाभ हुआ, या कश्मीरियों को क्या लाभ हुआ। कोई भी देश में नियम या कानून बनते है, तो जनता हित हमेशा सर्वोपरि होता है…, लेकिन आज दवा की कमी और अनाज की कमी तक से लोग जान गवा रहे है। एस.एन.लाल
जब आज लोग अपना दर्द बयान करते है, तो उनको कश्मीरी पण्डितों की याद दिलाई जाती है, आतंकवादियों ने पाकिस्तान की शय थी 19 जनवरी 1990 में कश्मीरी पण्डितों पर हमला बोल दिया, जिसमें 340 कश्मीरी मारे गये और हज़ारो की तआदाद में अपनी जान जाने के डर से कश्मीरी पण्डितों ने कश्मीर छोड़ दिया, जोकि बहुत ही ग़ल्त हुआ। लेकिन इस घटना के पीछे आम कश्मीरी से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन हर बार सज़ा उसी का मिलती है। एस.एन.लाल
उसी समय पर 24 अक्टूबर 1989 से 15 जनवरी 1990 तक भागलपुर सरकारी आकड़ों के अुनसार 1123 मुसलमानों को क़त्ल किया गया था। इस नरसहांर में कौन दोषी था, ये पुराने समाचार पत्रों मंे मिल जायेगा, इस नरसहांर में कोई बहार के आतंकवादी नहीं थे। आम मुसलमान को उसका बदला दिखाकर, कश्मीर साफ्ट टारगेट था, तो आतंकवादियों ने कश्मीर के हिन्दूओं को टारगेट किया, जोकि ग़ल्त तो था ही। कश्मीर में 19 जनवरी 1990 से 9 अक्टूबर 1996 तक गर्वनर और राष्ट्रपति शासन रहा, लेकिन कश्मीरी पण्डितों के लिए वापसी की कोई मज़बूत करामद कोशिश नहीं हुई, उधर भारत सरकारें भी अपनी राजनीति चमकाने और भागलपुर के दाग़ों को धोने के लिए कश्मीरी पण्डितों की बलिी दे दी। भागलपुर ही नहीं फिर 1992 में मुम्बई में और 2002 में अहमदाबाद में मुसलमानों नरसहांर हुआ…, जोकि केवल राजनीति के भेंट चढ़े।
बात यही ख़त्म नहीं होती कश्मीर 19 जनवरी 1990 की घटना के बाद कश्मीरियों पर ऐसे ज़ुल्म टूटे, कि मीडिया भी उसको लिखने की हिम्मत न कर सका। बीबीसी समाचार के अनुसार वहां सेना ने क्रेक डाउन अभियान चलाया, जहां मर्दो को घरों से निकाल कर अलग कर दिया, और उनको मारा – पीटा गया, वही सेना द्वारा कश्मीरी औरतो के साथ बलात्कार किया गया। 23 व 24 फरवरी 1991 में कुपवाड़ा जिले के कुनन पोशपोरा गांव में क्रेक डाउन अभियान चलाकर मर्दो को अलग करके मारा गया और वहां 40 कश्मीरी औरतों के साथ चौथी…… राइफल्स के सैनिको ने बालात्कार किया। ये घटना केवल एक गॉंव की थी… और भी स्थानों से ऐसी घटनाओं के समाचार मिले।
वही इण्डिया टूडे के 1994 के एक अंक में आया, कि कई दैनिक मज़दूरो को उनकी जगह से सुबह 7 बजे उठाकर, घाटी मंे ले जाकर मार दिया और उनको आतंकवादी घोषित कर दिया, यह बात तो तब सामने आयी, जब उन कश्मीरियों में मज़दूर हिन्दू भी था, जोकि चेहरे से मुस्लिम लग रहा था। 1990 से 2019 तक 41000 कश्मीरी मुस्लिम मारे जा चुके है, जबकि इसमें केवल 25 से 30 प्रतिशत कश्मीरी आतंकवादी या आतंवादियों से सम्बन्ध रखते होंगे। एस.एन.लाल
जिन कश्मीरी पण्डितों का इस्तेमाल करके इन घटनाओं को अन्जाम दिया गया, वही कश्मीरी पण्डितो को जम्मु में क्या हाल है, गन्दी बस्ती में रहते है, न पानी की सही सप्लाई है, न लाइट पूरी तरह से आती है, अनगिनत परेशनियों से झूझ रहें हैं। बीबीसी समाचार के अनुसार वही कश्मीरी पण्डित संजय टीकू कहते, ‘मैं कश्मीर में सर उठा कर जीता हूँ, सर झुका कर नहीं,’’ और मुस्लिम भाई मेरे मित्र है…! कश्मीर के पैंथर्स पार्टी के अध्यक्ष भीम सिंह कहते हैं कि हालात पहले से काफी बेहतर है (धारा 370 हटने से पहले) ‘मैं राजपूत हूँ, एक हिन्दू हूँ. मैं खुली गाड़ी में श्रीनगर जाता हूँ। सबसे हंसी खुशी मिलता हूॅं। संजय टीकू के अनुसार कश्मीर में 186 अलग-अलग जगहों पर आज भी कश्मीरी पंडित रहते हैं। उनको किसी आम कश्मीरी से न कोई डर है और न शिकायत।
संजय टीकू कहते है…मै भी लोगों के कहने से कश्मीर छोड़कर जम्मु व दिल्ली गया, लेकिन वहां मुझे कोई हिन्दू हमर्दद नहीं मिला। मकान मालिक मिला या व्यापारी, पैसे हो तो रहो…! मैने सोचा इससे अच्छा अपना वतन कश्मीर है, मै वापस आ गया…, मै मरुंगा तो अपने वतन में ही। दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी पण्डितों ने जन्तर-मन्तर धारा 370 हटने का विरोध करते नज़र आये। वहीं जम्मु के लोगों को ज़्यादा डर है, क्योंकि मैदानी क्षेत्र का आदमी जम्मु के निकट ही ज़मीन खरीदेगा, घाटी में जाकर नहीं खरीदेगा, जिससे जम्मु में ज़मीनों की दरें बढ़ने का डर है।
अलगावंवादी नेता और देश की राजनीति करने वाले नेताओं और ग़ल्त नीतियों का सज़ा आम जनता अपने जान-माल से भुगत रही है…, जबकि आम कश्मीरी का इन सब से कोई लेना-देना नहीं…, वह तो सुकून और दो वक़्त की रोटी चाहती है। एस.एन.लाल
सेनिया जब्बार ने अपनी निबंधन ‘स्पिलिट ऑफ प्लेस’ में दर्ज किया है जिसे मैगज़ीन सिविल लाइंस के पंाचवे अंक में प्रकाशित किया था। कश्मीरियों को कभी अपना नहीं समझा गया, बस कश्मीर की चाह रही…! आज भी कश्मीर को जोड़ने की या कश्मीर को ठीक से जानने की कोई किताब नज़र नहीं आती, हम कश्मीर को बस समाचापत्रों और फिल्मों के माध्यम से ही जानते है। जहां समाचार पत्र कश्मीर जाने का भय दिखाते है, वही फिल्में कश्मीर जाने को मन ललचाती है। वैसे संसार में आदमी की ये प्रवत्ति है कि वह हर खुबसूरत चीज़ को पाना चाहता है…और उस चीज़ को पाने के लिए इतनी हद तक चला जाता है कि उस खुबसूरत चीज़ को कितना नुक़सान पहुंच रहा है, इसकी भी वह परवाह नहीं करता। वही आज कश्मीर के साथ हो रहा है…!

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