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शाहजहां हकीकत में आधा राजपूत और आधा मुगल था

राजपूत मां का बेटा शाहजहां सिर्फ मुसलमान कैसे

बीते कुछ दिनों में मुगलों को लेकर काफी कुछ बुरा भला कहा गया हद तो तब हो गई जब ताज महल को भारतीय इतिहास पर धब्बा बता दिया गया. इस बहस के बीच ये जानना बेहद जरूरी है कि जिन्हें हम मुगल कह रहे हैं वो वास्तव में मुगल ही थे या फिर उनमें भारतीय खून मिल चुका था. भारत के मुगल वंश का सच क्या है और क्यों ये माना जाए कि मुगलों पर, उनकी इमारतों पर सवाल उठाना दरअसल राजपूतों, जाटों पर भी सवाल उठाना है.

दरअसल तैमूर लंग (उज्बेकिस्तान) को अपना पूर्वज मानने वाले मुगलों का इतिहास अगर हुमायूं तक ही होता तो हम कह सकते थे कि वो बाहरी लोगों का इतिहास है लेकिन इससे आगे का इतिहास दरअसल राजपूतों, जाटों, पठानों, उज्बेकों, इरानियों  और तुर्कियों का साझा इतिहास है जिसे अब हम विदेशी मान रहे हैं. इस बात को मानने की दो वजह हैं  पहली मुगलों की पत्नियां दूसरी मुगल सेना.

मुगलों की पत्नियां-

सम्राट अकबर ये जानता था कि हिंदुस्तान में जड़ें जमाने के लिए राजपूतों का भरोसा जीतना बेहद जरूरी है. उसने ऐसा किया भी. भरोसे की जो बुनियाद अकबर ने रखी उसे मुगलों की अंतिम पीढ़ी तक बखूबी निभाया गया अगर एक आध विवाद अलग रखे जाएं तो.

अकबर के शासनकाल में कुल 34 शादियां हुई राजपूतों और मुगलों के बीच, जहांगीर के वक्त कुल 7, शाहजहां के वक्त 4 और औरंगजेब के वक्त कुल 8 शादियां हुईं.

1562 से 1707 तक मुगलों और राजपूतों के बीच हुए प्रमुख वैवाहिक संबंध-

1- जनवरी 1562, अकबर ने राजा भारमल की बेटी से शादी की. (कछवाहा-अंबेर)

2-15 नवंबर 1570, राय कल्याण सिंह ने अपनी भतीजी का विवाह अकबर से किया (राठौर-बीकानेर)

3- 1570, मालदेव ने अपनी पुत्री रुक्मावती का अकबर से विवाह किया. (राठौर-जोधपुर)

4- 1573, नगरकोट के राजा जयचंद की पुत्री से अकबर का विवाह (नगरकोट)

5-मार्च 1577, डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)

6-1581, केशवदास ने अपनी पुत्री का विवाह अकबर से किया (राठौर-मोरता)

7-16 फरवरी, 1584, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का भगवंत दास की बेटी से विवाह (कछवाहा-आंबेर)

8-1587, राजकुमार सलीम (जहांगीर) का जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से विवाह (राठौर-जोधपुर)

9-2 अक्टूबर 1595, रायमल की बेटी से दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)

10- 28 मई 1608, जहांगीर ने राजा जगत सिंह की बेटी से विवाह किया (कछवाहा-आंबेर)

11-पहली फरवरी, 1609, जहांगीर ने राम चंद्र बुंदेला की बेटी से विवाह किया (बुंदेला, ओर्छा)

12-अप्रैल 1624, राजकुमार परवेज का विवाह राजा गज सिंह की बहन से (राठौर-जोधपुर)

13-1654, राजकुमार सुलेमान शिकोह से राजा अमर सिंह की बेटी का विवाह(राठौर-नागौर)

14-17 नवंबर 1661, मोहम्मद मुअज्जम का विवाह किशनगढ़ के राजा रूप सिंह राठौर की बेटी से(राठौर-किशनगढ़)

15-5 जुलाई 1678, औरंगजेब के पुत्र मोहम्मद आजाम का विवाह कीरत सिंह की बेटी से हुआ. कीरत सिंह मशहूर राजा जय सिंह के पुत्र थे. (कछवाहा-आंबेर)

16-30 जुलाई 1681, औरंगजेब के पुत्र काम बख्श की शादी अमरचंद की बेटी से हुए(शेखावत-मनोहरपुर)

संबंधित चित्र

राजपूत थी शाहजहां की मां

इसमें सबसे हैरान कर देने वाली शादी 1587 में जहांगीर और मोटा राजा की पुत्री जगत गौसांई की थी. जगत गौसांईं से ही 5 जनवरी 1692 को लाहौर में शाहजहां का जन्म हुआ. बेहद खुश अकबर ने जन्म के छठे दिन उसका नाम खुरर्रम (खुशी) रखा. यह ऐसा ऐताहिसक तथ्य है जिसे छिपाया नहीं जा सकता. यानी शाहजहां की मां एक राजपूत महिला थी और औरंगजेब जो शाहजहां का बेटा था उसकी वो दादी थीं.

डॉक्टर स्कंद शुक्ला कहते हैं कि मुगल बादशाह और राजपूत रानी से पैदा होने वाली संतान दरअसल आधी मुगल और आधी राजपूत होगी. जेनेटिक रूप से संतान में आधे गुण यानी 23 क्रोमोसोम पिता से और 23 क्रोमोसोम मां से आते हैं. मुगलों के पितृ सत्तात्मक समाज में जरूर उसे मुगल बताया गया लेकिन जैविक रूप से वो आधा भारतीय और आधा मुगल रह गया. उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया अगर इसी तरह आगे बढ़ती है यानी उसकी अगली पीढ़ी में राजपूतों गुण ज्यादा और मुगल गुण कम होंगे.

shahjahan के लिए चित्र परिणाम

यहां गौर करने वाली बात यह है कि मुगलों और राजपूतों के बीच शादियां और औरंगजेब के समय में भी जारी रहीं. खुद औरंगजेब की दो हिंदू पत्नियां थीं.

राजपूतों की बेटियां सिर्फ हरम तक ही सीमित नहीं थीं. उस दौर में ये मुगल बादशाहों के फैसलों को प्रभावित करतीं थीं. यहां कुछ वाकये गौर करने वाले हैं. बदायूंनी लिखते हैं कि अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों से प्रभावित होकर बीफ, लहसुन और प्याज तक खाना छोड़ दिया था. 1604 में हमीदा बानो बेगम की मौत के बाद अकबर ने सर मुंडवा लिया था. 1627 में शाहजहां की राठौर पत्नी जौधपुर में 8 दिन तक रुकी ताकि अपने पति के गद्दी पाने के लिए पर्याप्त समर्थन जुटा सके.1605 में जहांगीर ने अपनी हिंदू पत्नी की मौत के गम में 4 दिन तक खाना नहीं खाया. तुजुक ए जहांगीरी में इसका वर्णन है.

इतिहास में जहांगीर की पत्नी नूरजहां का काफी जिक्र होता है लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया जब शिकार के दौरान जहांगीर मुश्लिक में पड़ गए. एक शेर ने उन पर हमला किया और उस वक्त उनकी दो सबसे प्रिय पत्निया नूरजहां और जगत गौसांईं उनके साथ थीं. जगत गौसांईं ने तुरंत पिस्तोल भरकर शेर पर चला दी, जहांगीर ने खुद इस वाकये का जिक्र किया है. नूरजहां को तब जगत गौसांई से कमतरी का ऐहसास हुआ और बाद में उसने भी शिकार करना सीखा.

मुगल सेना

पहले ये समझना बेहद जरूरी है कि मुगल सेना बनी कैसे थी. बर्नियर लिखते हैं मुगल सेना में स्थानीय लोगों जैसे राजपूत, पठान, बाहर से ईरानी, तुर्की और उज्बेक लोग शामिल होते थे. बर्नियर लिखते हैं कि अगर कोई शख्स सफेद रंग का ईरानी, तुर्की या उज्बेकी हो तो उसे मुगल मान लिया जाता था.

मुगल सेना तीन प्रमुख हिस्सों से मिलकर बनती थी जिसमें पहला हिस्सा पैदल सेना, दूसरा हिस्सा घुड़सवार और तीसरा हिस्सा तोपखाने का होता था. मुगल सेना की संरचना बताती है कि कुल सेना का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा राजपूतों, जाटों, स्थानीय पठानों से बनता था बाकी विदेशी मूल के लोग थे.

मुगल सेना में मनसबदारी की प्रथा थी. किसी राजा को मनसबदारी देना इससे तय होता था कि उसे कितने पैदल और कितने सवार जाट मिलने हैं. जाटों से यहां मूलत आश्रय जाटों, राजपूतों, पठानों से था. उदाहरण के लिए अगर किसी को मुगल बादशाह ने इक हजारी की पदवी दी तो इसका मतलब था कि वो 1000/1000 यानी एक हजार पैदल जाट और एक हजार घुड़सवार की सेना अपने पास रख सकता था. घोड़ों का खर्चा  शाही खजाने से दिया जाता था. बाकी उसे जागीर दी जाती थी.

यहां गौर करने वाली बात यह थी कि मुगलों का विशाल साम्राज्य सिर्फ किसी ईरानी, तुर्की या उज्बेकी की वजह से नहीं बना था बल्कि इसमें बड़ा योगदान राजपूतों, जाटों और पठानों का था. इन्हें भारत की लड़ाकू कौम माना जाता था जो अपनी बहादुरी के लिए विख्यात थीं. दौर चाहे अकबर का रहा हो या औरंगजेब का इनका औहदा बेहद बुलंद था. अतहर अली ने अपनी किताब में अलग-अलग बादशाहों के दौर में मनसबदारों की स्थिति को बखूबी इसे बयान किया है-

मुगलों की सेना में सौनिकों की संख्या

मुगलों की सेना में सौनिकों की संख्या

अतहर अली की इस टेबल से बखूबी समझा जा सकता है कि मुगलों के चारों बड़े बादशाहों के वक्त में राजपूतों , अन्य हिंदूओं और भारतीय मुस्लिम मनसबदारों की साझेदारी तकरीबन आधी रही है. यहां गौर करने वाली बात यह है ये सिर्फ ओहदेदार थे जबकि इनकी सेना मूलत राजपूतों, जाटों और पठानों से मिलकर बनती थी.

इसमें जो बात सबसे ज्यादा चौंकाती है वो है औरंगजेब का वक्त जिसमें न सिर्फ राजपूत मनसबदार भारी संख्या में थे बल्कि मराठा मनसबदारों की संख्या उनसे भी कहीं ज्यादा थी.

मुगल बादशाहों ने अपने सम्राज्य विस्तार के लिए राजपूत सरदारों पर हमेशा यकीन किया. यहां तक कि काबुल, कंधार, बर्मा, तिब्बत तक हमला करने के लिए उन्हें सबसे ज्यादा यकीन राजपूतों पर ही था.

जय सिंह ने शिवाजी को हराया

इस संबंध में एक वाकया गौर करने वाला है कि जब औरंगजेब की शिवाजी को रोकने की सारी कोशिशें नाकाम होने लगीं तो उसने मिर्जा राजा जय सिंह जो उस वक्त के सबसे बड़े मनसबदारों में से एक थे को दक्कन भेजा. जय सिंह ने एक के बाद एक किले जीतकर शिवाजी को हार मानने पर मजबूर कर दिया. जदुनाथ सरकार की किताब शिवाजी एंड हिज टाइम्स में बताया गया कि कैसे इस राजपूत राजा ने 11 जून 1665 को पालकी में इंतजार कर रहे शिवाजी से सिर्फ इसी शर्त पर मिलना स्वीकार किया कि वो शिवाजी की कोई शर्त नहीं मानेंगे उन्हें अपने सारे किले बिना शर्त देने होंगे. शिवाजी ने इस शर्त को स्वीकार किया. इसी के बाद शिवाजी औरंगजेब के दरबार में आने को मजबूर हुए.

जय सिंह का ओहदा औरंगजेब के वक्त इतना बुलंद था कि उनके कहने पर औरंगजेब ने राजा जसवंत सिंह जिसने दारा शिकोह का पक्ष लिया को माफ कर दिया और उसकी मनसबदारी भी बरकरार रखी.

राजपूत राजाओं ने मुगल काल में कई शहर बसाए, मंदिर बनवाए. उदाहरण के लिए राजा मान सिंह ने बंगाल में राज महल नगर बसाया. राव करन सिंह ने दक्कन में करनपुरा बसाया. रामदास कछवाहा और राम मनोहर ने पंजाब में बाग बनवाए. मान सिंह ने उड़ीसा में मंदिर बनवाया. बीर सिंह बुंदेला ने मथुरा में मंदिर बनवाया. राव करन सिंह ने नासिक के मंदिरों को भारी दान दिया. अमूमन राजा अपने इलाके में ऐसे काम करते हैं लेकिन जहां उन्हें तैनात किया गया वहीं उनका ऐसा करना जताता है कि उन्हें मुगल सल्तनत से ऐसा करने की आजादी थी.

राजकुमार शाह शूजा जब तख्त के लिए आगरा के लिए बढ़ा तो उसे रोकने के लिए राजकुमार सुलेमान शिकोह के साथ शाहजहां ने राजा जय सिंह और अनिरुद्ध गौढ़ को भेजा था. यहां एक बात और चौंकाती है कि बड़ी संख्या में राजपूतों ने तख्त की लड़ाई में औरंगजेब का साथ दिया. इसमें शुभ करन बुंदेला, भागवत सिंह हाड़ा, मनोहर दास हाडा, राजा सारंगम और रघुनाथ राठौर प्रमुख थे. यहां गौर करने वाली बात ये है कि अधिकतर राजपूत राजाओं ने तख्त की लड़ा में शाहजहां और उसके बड़े बेटे दारा शिकोह का विरोध किया था.

इन तथ्यों की रोशनी में अगर मुगल का मतलब सिर्फ मुसलमानों से निकाला जाता है तो यह हास्यासपद होगा. असल में मुगलों की संस्कृति एक साझा संस्कृति थी जिसकी सफलता में उज्बेकों, ईरानियों से कई गुना ज्यादा राजपूतों, जाटों, भारतीय मुसलमानों का योगदान था. मुगलों की इमारतों की बुलंदियां के पीछे इन कौमों का खून पसीना शामिल है. जब हम मुगल इमारतों पर सवाल उठाते हैं तो सही मायने में हम राजपूतों, जाटों और भारतीय मुसलमानों की एक साथ मजाक उड़ा रहे होते हैं. इस तथ्य पर पूरे समाज को गौर करने की जरूरत है.

आभार : Afsar Ahmed

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