Wednesday , August 12 2020

सुलहें हुदेबिया का हवाला देकर मदनी-भागवत की मुलाक़ात को सही ठहराना उचित या अनुचित ?

तौसीफ़ क़ुरैशी राज्य मुख्यालय लखनऊ।

अभी हाल फिलहाल में एक ऐसा घटनाक्रम हुआ जिसे देख व सुन लोग अचंभे में पड़ गए जो लोग अचंभे में पड़े वो गलत भी नही थे जब दो ऐसी विचारधारा बंद कमरे में बात करने को बाध्य हो गई हो जिन्होंने अपने जन्म से लेकर आज तक मिलना तो दूर मिलने पर विचार तक न किया हो तो लोगों को अचंभा तो होगा ही इसमें कुछ भी गलत नही है। मामला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और जमीअत उलमा-ए-हिन्द के बीच बंद कमरे में हुई मुलाक़ात का है जिसके बाद से देवबन्दी हल्के में काफ़ी हलचल है तरह-तरह की बातें हो रही है वो बातें करने वाले गलत भी हो सकते है और सही भी लेकिन इसके लिए दोनों लोगों को सामने आकर लोगों की शंकाओं को दूर करने की पहल करनी चाहिए।

ये बात अपनी जगह है अभी तो इस पर लोग सोच ही रहे थे कि क्या हुआ और क्यों हुआ यह घटनाक्रम 30 अगस्त 2019 दिन शुक्रवार का है इसी बीच शुक्रवार 6 सितंबर 2019 की शाम जमीअत उलमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी से कांग्रेस के चाणक्य एवं राज्यसभा सांसद अहमद पटेल की मौजूदगी में मुलाक़ात कर मोहन भागवत से हुई मुलाक़ात को हल्का करने कोशिश की या कुछ और मौलाना ने क्या संदेश देने की कोशिश की है कि सरसंघचालक मोहन भागवत से हुई हमारी मुलाक़ात को तूल न दिया जाए या कुछ भी …. समझ लिया जाए भारत का मुसलमान हो या हिन्दु मौलाना के श्रीमती सोनिया गांधी से मिलने को कोई बुराई या गलत तरीक़े से नही देखते क्योंकि यह ऐसी विचारधारा है जो जमीअत की विचारधारा से मेल खाती है लेकिन संघ की विचारधारा जमीअत की विचारधारा से मेल नही खाती है उसके बाद भी संघ जैसी विचारधारा से मिलने पर सवाल लाज़मी है सवाल होने भी चाहिए और हजरत मौलाना सैयद अरशद मदनी को आगे आकर इस पूरी मुलाक़ात पर विस्तारपूर्वक चर्चा करनी चाहिए क्योंकि अगर मौलाना संघ के बुलाने पर संघ के दिल्ली स्थित झंडेवालान कार्यालय में जाने के लिए विवश हुए और संघ को भी अपना रूख साफ करना चाहिए कि उसे जमीअत की तरफ़ हाथ क्यों बढ़ाने पड़ रहे है हालाँकि जमीअत के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैयद अरशद मदनी पर शक नही किया जा सकता यह बात भी सही है लेकिन मामला एक ऐसी विचारधारा का है जिस विचारधारा से देश में नफ़रतों की बुनियाद रखी जा रही है जिस वजह से देश गलत ट्रैक पर जा रहा है।

इस ट्रैक पर चलने का हर हिन्दु और मुसलमान विरोध करेगा जो देश के भाईचारे से प्यार करता है जिस विचारधारा का जमीअत उसके जन्म से ही विरोध करती चली आ रही है विरोध करना गलत भी नही है अभी तक जमीअत कहती थी कि संघ इस देश को हिन्दुराष्ट्र बनाना चाहता है और ये सही भी है यही संघ का मुख्य एजेंडा भी है आज जो देश में हिन्दु-मुसलमान के बीच नफ़रतों की खाई बन गई है या यूँ कहे कि संघ ने बना दी है तो गलत नही होगा संघ अपने जन्म से इस मिशन पर लगा हुआ है जिसमें वह कुछ सफल भी है और असफल भी सफल समझने वाले भक्त है और असफल समझने वाला सेकुलर बुद्धिजीवी वर्ग है जो इसको किसी क़ीमत पर स्वीकार नही करता है आज हम उसके दरवाज़े पर हाजरी लगा रहे है या तुम्हे अपने दरवाज़े बुला रहे है ये अलग विषय है बातचीत पर सवाल तो उठना लाज़मी है तरीका कुछ भी हो लेकिन सवाल होना चाहिए। सवाल करने के बहुत से कारण है जो जायज़ भी है एक ऐसा संगठन जिससे हमने अब तक दूरी बनाए रखी उससे अचानक मिलना या योजनाबद्ध तरीक़े से मिलना लोगों के दिमाग में बैचेनी पैदा करता है कि ऐसा क्या हो गया जो सदियों से फ़ासला चला आ रहा है उसे कम करने की ओर उसकी तरफ़ बढ़ने की या बढ़ाने की बात की जाने लगी हो दोनों ही ओर से अगर ये गुंजाईश थी तो अभी तक दोनों ही नेतृत्व अपनी-अपनी विचारधारा के मानने वालों को क्यों गुमराह करते चले आ रहे थे और गुंजाईश नही है तो ज़बरदस्ती क्यों गले पड़ा जा रहा है एक दूसरे के यही सब सवाल है जो लोगों के दिलों दिमाग में घूम रहे है।

जहाँ से ये सवाल पैदा हुए शुक्रवार 30 अगस्त 2019 को हिन्दुस्तान की सियासत में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसकी आज के दौर में कल्पना करना भी मुश्किल है लेकिन ऐसा हुआ तो सियासत पर नज़र रखने वाले सोचने के लिए मजबूर हो गए कि ये क्या और क्यों हुआ है ? सियासी लोगों और इतिहासकारों ने अपने-अपने हिसाब से क़यास लगाने शुरू कर दिए है हालाँकि अभी दोनों ओर से कुछ नही कहा गया कि मिलने का कारण क्या था क्यों मिले किन मुद्दों पर चर्चा हुई यह अभी सामने नही आया है दोनों संगठनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है ये सवाल लोगों के दिलों में है जिसका जवाब हिन्दुस्तान की दोनों ही विचारधारा के लोग जानना चाहते है लेकिन जवाब दोनों ही और से नही मिल रहा है जो संघ सरसंघचालक से हुई मुलाक़ात को सवालों के घेरे खड़ा करता है जमीअत उलमा-ए-हिन्द विचारधारा के मानने वाले जमीअत के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैयद अरशद मदनी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक मोहन भागवत की मुलाक़ात को सुलहें हुदेबिया का हवाला देकर सही क़रार दे रहे है जमीअत की विचारधारा के समर्थक इस मुलाक़ात को हुजुरे-ए-अकरम स० अलेही व सल्ललम के द्वारा बुतों को पूजने वालों से (जिन्हें मुसरिक कहा जाता है) किए गए एक समझौते का हवाला दे रहे है जिसे इस्लाम में सुलहें हुदेबिया के नाम से जाना जाता है क्या इसे सुलहें हुदेबिया से जोड़ना उचित है या अनुचित ? ये भी एक सवाल है।

बात आका-ए-नामदार मौहम्मद साहब के टाइम की है मक्का को आज़ाद कराना था वो भी बिना किसी का ख़ून बहे आपने कुछ समझौते किए थे लेकिन मामला अल्लाह के घर का था क्या इन दोनों लोगों के बीच यहाँ भी कोई ऐसा मामला हुआ है ? ऐसा कुछ नज़र नही आता चाहे हो परन्तु ये बात तो दोनों ही विचारधारा के नेतृत्व को बतानी पड़ेगी जैसा सुलहें हुदेबिया करने के बाद आका-ए-नामदार मौहम्मद साहब स० हू अलेही व सल्ललम ने पूरी जानकारी अपने लोगों को दी थी आप जब सुलह सुलहें हुदेबिया का हवाला दे रहे हो तो उसी तरह के मामलात भी करो क्यों छुपाया जा रहा है? ये दोनों विचारधारा के मानने वालों का मामला है दोनों का व्यक्तिगत मामला तो है नही तो बताने में क्या दिक्कत है साफ़गोई इंसानों को कोई दिक्कत नही होती है।

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