Friday , May 14 2021

एक फ़तवा जिसके बाद शिक्षा और विज्ञान में पिछड़ गए मुसलमान

एक फतवा जिसके बाद शिक्षा और विज्ञान में पिछड़ गए मुसलमान

आज से तक़रीबन एक हज़ार साल पहले 1100 AD में मज़हबे-इस्लाम साइंस के गोल्डन दौर से गुज़र रहा था। ये वो दौर था जब बग़दाद साइंस और जदीद टेक्नोलॉजी का मरकज़ हुआ करता था। दुनिया भर के तालिब-ए-इल्म साइंस की जदीद तालीम के लिए बगदाद का रुख करते थे।

उस दौर में यूरोप तालीम के ऐतबार से तारीकियों में डूबा हुआ था। साइंस मुसलमान की पहचान माना जाता था। ये वो दौर था जब दुनियावी तालीम के हर शोबे बीजगणित, एल्गोरिथम, कृषि, चिकित्सा, नेविगेशन, खगोल विज्ञान, भौतिकी, कॉस्मोलॉजी, मनोविज्ञान वग़ैरा वग़ैरा में मुसलमान एक पहचान माना जाता था।

यह भी पढ़ें : आंदोलन का प्रजातंत्र

फिर ये हुआ कि ये सब अचानक रुक गया। इल्म, फ़लसफ़ा, ईजाद और दानाई का ये दौर मुसलमानों के बीच से अचानक ग़ायब होने लगा। वजह? वजह बना एक फ़तवा जो अपने वक़्त के इस्लामिक विद्वान कहे जाने वाले इमाम अल ग़ज़ाली (1058 – 1111) ने अपनी मशहूर किताब तहाफुत अल फ़लसफ़ा (تهافت الفلاسفة) के ज़रिए दिया।

किताब की इस तफ़्सीर के मुताबिक़ नम्बर्स (संख्याओं) के साथ खेलना शैतान का काम है इसलिए गणितीय गणना से मुसलमानों को दूर रहना चाहिए। इमाम अल ग़ज़ाली ईरान के खोर्सान सूबे के तबारन में पैदा हुए। उस दौर के मुसलमानों के बीच उनका इतना रुतबा था कि लोग उन्हें मुजद्दिद और हुज्जत-उल-इस्लाम कहते थे।

यह भी पढ़ें : हिन्दू मुसलमान की अफ़ीम का नशा उतरने से बिगड़ रहा मोदी की भाजपा का खेल

ज़ाहिर है उस वक़्त के मुसलमानों ने इस फ़तवे के ख़िलाफ़ जाना इस्लाम के ख़िलाफ़ जाना तसव्वुर किया। नतीजा ये हुआ कि मुसलमानों ने उन सब साइंसी ईजादों और रिसर्च से मुंह फेर लिया जिनमें किसी भी तरह की कैलकुलेशन होती थी..और हम जानते हैं कि बिना मैथमेटिकल कैलकुलेशन के आप किसी भी तरह की जदीद टेक्नोलॉजी में कामयाब हो ही नहीं सकते। यानि लगभग हर तरह के साइंस से मुसलमानों ने मुंह फेर लिया।

अमेरिका के नील डी ग्रास टाइसन ( Neil deGrasse Tyson ) जिन्हें मौजूदा दौर का आइंस्टीन माना जाता है, के मुताबिक़ इमाम ग़ज़ाली की यही बुनियादी ग़लती साबित हुई और मुसलमान हर तरह के इल्म से पिछड़ता चला गया।

इमाम ग़ज़ाली के इस फतवे के बाद सब कुछ जैसे थम सा गया। किसी ने मानो उसे अपाहिज बना दिया। इनके इस ग़लत इंटरप्रिटेशन की वजह से इस्लाम आज तक नहीं उभर पाया है। उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाया।

यह भी पढ़ें : इताअत में मयाना रवी

दूसरा बड़ा झटका तब लगा जब प्रिंटिंग प्रेस की ईजाद हुई और जिसको हराम क़रार दिया गया था। तुर्की के ऑटोमन ख़िलाफ़त (1299 – 1922) के दौर में जब जर्मनी में 1455 में प्रिंटिंग प्रैस की ईजाद हुई तो उस वक़्त के सुल्तान सलीम (अव्वल) ने ख़िलाफ़त के शैख़ुल-हदीस के कहने पर किसी भी तरह की किताब के छापने पर पाबन्दी लगा दी। और एलान किया कि जो कोई भी प्रिंटिंग प्रेस का इस्तेमाल करता पाया गया, उसको मौत की सजा दी जाएगी।

ये 1515 की बात है। उस वक़्त ख़िलाफ़त तुर्की से निकलकर साउथ ईस्ट यूरोप, सेंट्रल यूरोप के कुछ हिस्सों, वेस्टर्न एशिया और नार्थ अफ़्रीक़ा तक फैली हुई थी। इस फ़तवे का बहुत दूर तक असर हुआ और उस वक़्त की मुसलमानों की तरक़्क़ी की रफ्तार यकायक थम गई।

यह भी पढ़ें : मुस्लिम ताजीरों का अख़लाक़ और मोहब्बत

दूसरी अक़वाम ने उसे हाथों हाथ लिया और साइंस पर मबनी किताबें, रिसर्च पेपर्स, न्यूज़ पेपर्स, इन्वेंशन आर्टिकल्स छापे जाने लगे, दूर-दूर तक इल्म फैलने लगा और दूसरी क़ौमें इससे फायदे उठाने लगीं। प्रिंटिंग प्रेस पर मुसलमानों का ये खुदसाख़्ता बैन तक़रीबन 1784 में जाकर हटाया गया लेकिन फिर भी मुस्लिम दुनिया में पहली किताब 1817 में जाकर छापी जा सकी।

यानी प्रिंटिंग प्रैस की ईजाद से तक़रीबन 362 सालों की तवील मुद्दत के बाद। इन 362 सालों में पूरी दुनिया कहां से कहां पहुंच गई थी। नई-नई ईजादों और इल्म की रौशनी जो प्रिंटिंग प्रेस के ज़रिए फैली थी, मुसलमान उस रौशनी से महरूम ही रहा। ये थे वो दो फ़तवे जिनकी वजह से मुसलमान आज वहां नहीं है जहाँ उसे होना चाहिए था।

यह भी पढ़ें : साइंस भी इस्लाम के क़ानून की हिमायत करने पर मजबूर

आज अगर हम इन फ़तवों के बारे में सोचते हैं तो अजीब लगता है कि आखिर इसमें ग़ैर-इस्लामी और हराम क़रार दिए जाने जैसा क्या था! लेकिन आज भी हम ऐसे ही हैं, जैसे उस ज़माने में थे। आज भी अजीब-अजीब फ़तवे दिए जाते हैं और हम अपनी ज़बान सिले रहते हैं, बल्कि कहा जाए कि इन फ़तवों का खैर-मक़दम करते हैं।

और हमारी इस फितरत की वजह साफ़ है कि हम मज़हबे-इस्लाम को आज भी ठीक तरह से नहीं समझ पाए हैं। जो हमारे उलेमा-ए-दीन ने कह दिया वो हमारे लिए पत्थर की लकीर की तरह है। हम यह मानने के लिए तैयार ही नहीं हैं कि उलेमा-ए-दीन भी ग़लती कर सकते हैं।

यह भी पढ़ें : हातिम ताई की बेटी

बहरहाल अजीब फ़तवों की फेहरिस्त लम्बी है। कुछ और नमूने पेश हैं – जब हवाई जहाज़ की ईजाद हुई तो बर्रे सग़ीर से फ़तवा जारी किया गया कि जहाज़ में सफ़र करना हराम है। फ़तवे के मुताबिक़ इतनी ऊंचाई पर इंसान का सफ़र करना खुदा की कुदरत को ललकारने जैसा है।

इसी तरह जब रेडियो की ईजाद हुई तो फतवा दिया गया कि ये शैतान की आवाज़ है। कैमरा और टीवी पर तो आज तक फ़तवा जारी है। इसी तरह आज कोई ब्लड ट्रांसफ्यूजन को हराम क़रार दे रहा है और कोई हेयर ट्रांसप्लांट को। कोई जेनेटिक इंजीनियरिंग को हराम क़रार दे रहा है।

यह भी पढ़ें : अंदाज़े ट्विटर रहेगा तो 22 में Bye Bye बाइसिकल दिखेगा !

पूरी दुनिया के साइंसदां यूनिवर्स के एक्सप्लोरेशन की खोज के सुनहरे दौर तक पहुंच चुके हैं। ग्रैविटेशनल फाॅर्स वेव्स और Higgs पार्टिकल्स की बात हो रही है। लोग एक्सप्लोर कर रहे है,यूनिवर्स के क्वांटम स्टेट के बारे में पूछ रहे हैं।

Cosmology की infinity के बारे में सवाल उठाये जा रहे हैं। मार्स के सरफेस पर रिसर्च हो रहे हैं। मेडिकल साइंस भी जेनेटिक इंजिनीरिंग तक जा पहुंचा है जिससे कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी बस ख़त्म होने को है और ये सिर्फ एक छोटी सी झलक है कि दुनिया कहां से कहां पहुंच चुकी है।

यह भी पढ़ें : भाजपा को फायदा पहुंचने वाला होगा ओवैसी का यह कदम

और हम? हमारी समझ और मैच्योरिटी का लेवल ये है कि हम अभी तक इस बात से खुश हो जाते हैं कि एक खीरे में “अल्लाह” या “मुहम्मद” लिखा पाया गया है। हमारी समझ का लेवल ये है कि किसी क़ुरबानी के बकरे पर “मुहम्मद” लिखा हुआ पाया गया है। ये आखिर है क्या और हम इससे दीन की क्या ख़िदमत कर रहे हैं?

हम साबित क्या करना चाहते हैं? इसी पसमंज़र में आइए देखते हैं कि पिछले सौ सालों में हमने दुनिया को क्या दिया है या क्या उससे लिया है –

आइए देखते हैं कि सन् 1900 से 2018 के दौरान नोबेल प्राइज हासिल करने वालों में हम कहां हैं और बाक़ी दुनिया कहां है –

यह भी पढ़ें : निकाह के लिए काजी की जरूरत नहीं….

पूरी दुनिया में यहूदियों की आबादी ज़्यादा से ज़्यादा एक करोड़ पचास लाख है और मुसलमानों की आबादी लगभग सौ करोड़ पचास लाख। या कह लीजिए कि पूरी दुनिया की आबादी के मुक़ाबले सिर्फ 0.2% लेकिन नोबेल पाने वालों में उनकी तादाद 21.97% है। आज तक कुल 892 लोगों को नोबेल दिया जा चुका है उसमे से 196 नोबेल यहूदियों के नाम हैं। यहूदियों के मुक़ाबले मुसलमानों की आबादी लगभग सौ गुना है लेकिन कुल मिलाकर सिर्फ तीन नोबेल। सिर्फ़ तीन। ये है दुनिया को हमारा योगदान।

यह भी पढ़ें : इस्लामी क्रांति की सफलता की 42वीं वर्षगांठ, एकअहम दिन

हो दरअसल ये रहा है कि पिछली एक सदी से हम पहले साइंस और जदीद टेक्नोलॉजी को हराम क़रार देते हैं और फिर मजबूरन उसे अपना भी लेते हैं। मोबाइल हराम, इंटरनेट हराम, फेसबुक हराम, ट्विटर हराम, टीवी हराम, तस्वीर बनाना हराम …। लगता है उम्मत सिर्फ़ हराम और हलाल का फ़र्क़ करने में ही ख़त्म हो जाएगी। इसका मकसद यह बताना है कि आज हमें शिक्षा और विज्ञान को बढ़ावा देते हुए विवेकपूर्ण निर्णय लेने की जरूरत है।

Source : मुनीस हैदरजी के वॉट्सऐप ग्रुप ISLAM THE WAY OF LIFE से

Please Subscribe-
Facebook WhatsApp Twitter Youtube Telegram

PLEASE ACKNOWLEDGE

The act of charity is very noble and highly admired by Allah (SWT). Just do it for the right people.
Voice of Muslim has been conveying the message of Islam to Muslims and non-Muslims. The aim is to make people aware of the factual news of Islam and the correct Islamic message
وائس آف مسلم مسلمانوں اور غیر مسلموں تک اسلام کا پیغام پہنچاتی رہی ہے۔ اس کا مقصد لوگوں کو اسلام کی حقیقت سے متعلق خبروں اور صحیح اسلامی پیغام سے آگاہ کرنا ہے
The Voice of Muslim independent, investigative journalism takes a lot of time, money and hard work to produce. …We are relying principally on contributions from readers and concerned citizens.
Your valuable contribution can save a life or make a difference to the quality of another human life, indirectly contributing to the social & economic stability of the community at large.
برائے کرم امداد کریں! Support us as per your devotion !
www.voiceofmuslim.in (since 2017)
Voice of Muslim
Account Details-
Acount Name :- VOICE OF MUSLIM
Bank Name :- STATE BANK OF INDIA
A/c No. :- 39107303983
IFSC CODE : – SBIN0005679
PAYTM MOBILE NO. 9005000008
Please share this message in community and be a part of this mission

About Shakeel Ahmad

Voice of Muslim is a new Muslim Media Platform with a unique approach to bring Muslims around the world closer and lighting the way for a better future.
SUPPORT US

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com