Wednesday , September 23 2020

आज़ादी के बाद सब घावों को सहलाते हुए किया हिन्दुस्तान का नव निर्माण

TAUSEEF QURESHI Accredited Journalist

बुनियाद से लेकर महल की तामीर में लगी ईंट दर ईंट हिलाने की कोशिश 

आज़ादी के बाद देश में दो विचारधाराओं ने जन्म लिया एक विचारधारा ऐसी थी जिसमें सबको साथ लेकर चलने की रणनीति थी दूसरी विचारधारा देश को धार्मिक आधार पर लेकर चलने की थी एक ने अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा कर लिया था पाकिस्तान बनाकर उसी तरह की एक सोच हिन्दुस्तान में ही रह गई थी सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा धार्मिक आधार पर चलने वाली विचारधारा पर लगभग साँठ साल तक भारी रही और धमाकेदार चलती रही लेकिन धार्मिक आधार पर देश को चलाने का ख़्वाब रखने वाली विचारधारा ख़ामोश नही रही वह भी रफ्ते-रफ्ते कभी उस विचारधारा के साथ तो कभी अकेले ही अपने लक्ष्य को भेदने के लिए चलती गई जो आज अपने उफान पर है लेकिन इसी दौरान धार्मिक आधारित विचारधारा के लिए कुछ मुनाफिकों का उस विचारधारा का भी समर्थन मिलता रहा जो कहने को सबको साथ लेकर चलने की हामी थी। ऐसे कुछ मुनाफिक लोगों की उस विचारधारा में या तो पहचान नही हो सकी या राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के पद चिन्हों पर चलने चलाने के ठेकेदार यह पता होते हुए भी उनको नज़रअंदाज़ करते रहे उसी का परिणाम है जो आज देश में हो रहा है वह किसी से छिपा नही है।

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आज़ादी के बाद सब घावों के सहलाते हुए हिन्दुस्तान का नव निर्माण किया

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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलने वाली विचारधारा ने देश को कहाँ से कहाँ तक पहुँचाया इस पर विद्वानों ने बहुत कुछ लिखा है अब इस पर लिखना उचित नही है यह सबको मालूम है हम क्या थे और क्या है। किसी विचारधारा पर चलने के परिणाम दूसरी विचारधारा के चलन में आने के बाद ही पता चलते है या हम जब ही महसूस करते है सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा ने 1989 में या उससे पहले दम तोड़ दिया था या दम तोड़ने की शुरूआत हो गई थी जब कांग्रेस के विरोध में एक दल बना जिसे जनता दल का नाम दिया गया था इसमें ज़्यादातर वही नेता शामिल थे जो अपने आपको सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा के हामी कहते थे लेकिन उनकी सत्ता को प्राप्त करने की लालशाह ने उस विचारधारा को भी शामिल कर लिया (यही फ़िलहाल बिहार में हो रहा है) जिसका एजेंडा आज़ादी से पूर्व ही तय हो गया था जो अंग्रेज़ों के लिए मुखबिरी कर आज़ादी के मतवालों को फाँसी के तख़्ते पर पहुँचाने से भी गुरेज़ नही करते थे और खुद माफ़ी माँग कर वीर कहलाते है। कमाल की बात देखिए जनता दल को वोट देने वाला वोटर भी धार्मिक आधारित विचारधारा की विरोधी था लेकिन कांग्रेस विरोध ने उसकी समझ में को भी निगल लिया और और धार्मिक आधारित विचारधारा ने सेकुलर विचारधारा कंधे पर सवार होकर दो सीट से 89 सीट तक पहुँच गए बस वही से धार्मिक विचारधारा का सफ़र शुरू हुआ जो आज हमारे सामने है।

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हिन्दुस्तान की आने वाली पीढ़ियाँ दोनों विचारधाराओं का जब तुलनात्मक गुणाभाग करेंगी तब ज्ञात होगा कि हमने क्या खोया और क्या पाया क्योंकि दोनों विचारधाराओं के परिणाम हमारी पीढ़ियों के सामने होंगे।कोई भी सकारात्मक या नकारात्मक थ्योरी जब तक क्रियान्वयन की कसौटी पर कसे बिना उसकी अच्छाई या बुराइयों का पैमाना नही बनाया जा सकता है जब तक क्रिया प्रतिक्रिया और उसके परिणाम तक न पहुँच जाए उसके मानने वालों को भी मलाल रहता है कि अगर हमारी विचारधारा मज़बूती से आ जाती तो हम या हमारी विचारधारा बहुत अच्छा कार्य करती देश की जनता ने धार्मिक आधारित विचारधारा को इतनी मज़बूती दी कि वह फिर यह कहने की स्थिति में नही है कि अगर ऐसा होता अगर वैसा होता किन्तु परन्तु सब पर विराम लगा दिया है।

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धार्मिक आधारित इस विचारधारा ने देश को क्या दिया और क्या देने की स्थिति में है इसका मूल्यांकन किया जा सकता है किया भी जा रहा है एक वर्ग इस विचारधारा पर चलने वालों की शुरू से ही मुख़ालिफ़त करता रहा है अगर मैं साफ़-साफ कहूँ तो उसमें सबसे अग्रणी मुसलमान को माना जाता है ऐसा भी नही है इसमें हिन्दू नही है उनकी भी बड़ी तादाद है लेकिन तुलनात्मक मुसलमान को ही माना जाता है क्योंकि आज़ादी मिलने की संभावनाओं के चलते ही मुसलमानों का एक गुट हिन्दुस्तान में रहने की मुख़ालिफ़त करने की ठान चुका था जिसकी हिन्दुस्तान में रहने वाले मुसलमानों ने ज़बरदस्त मुख़ालिफ़त की उसी का नतीजा है ज़्यादा मुसलमान हिन्दुस्तान में रहा और कुछ मुठ्ठी भर मुसलमानों ने पाकिस्तान को चुना क्योंकि उनका एजेंडा भी धार्मिक आधारित था इसलिए मुसलमानों की जब की कयादत करने वालों शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन देवबन्दी (रह), हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह), हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि ने सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा को माना और हिन्दुस्तान में ही रहने का फ़ैसला किया जिसका राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी पंडित जवाहर लाल नेहरू ने समर्थन किया आज़ादी की लड़ाई के सभी अग्रणी विद्वानों ने इस मुल्क को एक गुलदस्ता बनाने का ख़्वाब देखा था जिसे उन्होंने काफ़ी हद तक निभाने की कोशिश की और निभाया भी कुछ छुटपुट वाद विवादों को छोड़ दिया जाए तो वास्तव में हमारा मुल्क एक गुलदस्ता ही है या था।

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ख़ैर काफ़ी दिनों तक दो विचारधाराएँ चलती रही एक विचारधारा का तो अंत हो गया था छोटा सा पाकिस्तान बनाकर जो आज तक भी एक अच्छा मुल्क नही बन पाया वही एक विचारधारा और थी जो इसी मुल्क में रह गई जो तभी से नफ़रतों का सियासी कारोबार करती चली आ रही थी लेकिन वह कामयाब नही हो पा रही थी उसको कामयाब जो विचारधारा सबको साथ लेकर चलने वाली थी उसी विचारधारा के कुछ जय चंदों का अंदरूनी समर्थन मिलता रहा जिससे वह फलती फूलती रही जैसे अभी पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के निधन के बाद RSS चीफ़ मोहन भागवत ने कहा कि प्रणब दा के निधन से RSS को बहुत नुक़सान हुआ है हमने अपना एक गाइड खो दिया है और भी कई नाम है जो RSS को अंदरूनी मदद किया करते थे या है यह बात अपनी जगह है।

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शेखुल हिन्द हज़रत मौलाना महमूदुल हसन देवबन्दी (रह) हज़रत मौलाना रशीद अहमद गंगोही (रह), हज़रत मौलाना हुसैन अहमद मदनी (रह), मौलाना अबुल कलाम आज़ाद आदि ने सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा को क्यों माना था और हिन्दुस्तान में ही रहने का फ़ैसला क्यों किया था जिसका राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू आदि सरीखे नेताओं विद्वानों ने क्यों स्वागत किया था क्या वह कुछ जानते नही थे ? इस विचारधारा में शांति, प्रेम, भाईचारा और सहिष्णुता का पक्का ठोंस वादा था यक़ीन था तभी तो हिन्दुस्तान का डंका बजता था कि हिन्दुस्तान में कितने धर्मों के लोग एक साथ मिलजुल करके एक साथ रहते है उसी से गुलदस्ता बनता था उसमें दबे कुचले समाज को ऊपर उठाने की रणनीति थी किसी को आतंकित न करने की नीति थी यह इतिहास के सुखद क्षणों को याद कर आहत करने वाले क्षणों भुलाने और आज़ादी के बाद मिलकर आगे क़दम बढ़ाने के लिए प्रेरणा पर ज़ोर देती थी।

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सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा ने इस देश को देश बनाने में चार दसक लगा दिए लोकतंत्र, संविधान, की पटरियाँ बिछाने में इसके बाद तीन दसक विकास और इसकी समृद्धि को दिए हिन्दुस्तान दुनियाँ के बड़े देशों में शुमार हो गया। इसकी बुनियाद में लगी हर वह ईंट हमारे बुजुर्गों की क़ुर्बानियों की गवाही दे रही है तब जाकर हिन्दुस्तान रूपी महल तैयार किया गया है। दूसरी विचारधारा इस महल की नींव को कमज़ोर करने की कोशिश करती चली आ रही है इस मुल्क को मुल्क बनाने में सत्तर साल लग गए ऐसे ही तबाह नही होने देंगे हिन्दुस्तान को अपनी जान की बाज़ी लगानी पड़े तब भी पीछे नही हटेंगे ऐसा जज़्बा आज भी ज़िन्दा है हिन्दुस्तानियों में यह भी सब जानते है।

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इस दौरान तीन पीढ़ियों ने यह वक़्त देखा है सत्तर साल पिछली दो पीढ़ियों ने साम्प्रदायिकता के घाव देखे, विभाजन की पीड़ा देखी, नफ़रतों के नताईज देखे, शोषण से पैदा हुई ग़रीबी देखी इन सब घावों के सहलाते हुए हिन्दुस्तान का नव निर्माण किया भारत वासियों ने हम उस हिन्दुस्तान के वासी है जहाँ यह सब क़ुर्बानियों के अंबार है। तीसरी नस्ल ने यह सब क़रीब से नही देखा है उसे यह सब बना बनाया मिला है इस लिए वह भटक गई है उसे इस तरह के सब्ज़बाग़ दिखाए जा रहे है जैसे पहले कुछ हुआ ही नही यही वजह है कि जिन्हें मुर्ख या भक्त का नाम दिया गया है वह ना मूर्ख है ना भक्त है भटके हुए है नौजवानों को भटकाने की पाठशाला RSS की शाखाओं मिलती है जहाँ सब कुछ ग़लत फ़ीड किया जा रहा है वह उसे सही करने की राह तलाश रहे है जिसके लिए वह मरने कटने के लिए भी तैयार है।

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जब तक शरीर बीमार न हो अच्छे स्वस्थ्य की क़ीमत पता या अहसास नही होता है जब तक मौत सर पर ना नाचे ज़िन्दगी की क़ीमत का भी अहसास नही होता। 2014 में सबका साथ सबका विकास, अच्छे दिन आने वाले है, पन्द्रह-पन्द्रह लाख खातों में आएँगे जैसे खोखले नारे के दम पर चुना था 2019 पुलवामा की शहादत और क़ब्रिस्तान बनाम शमशान को चुना। शमशान और क़ब्रिस्तान को पूरा मौक़ा मिलना चाहिए पीढ़ियाँ याद रखेंगी इतिहास चिख चिख कर पुकारेगा कि कभी ऐसा भी होता था हिन्दुस्तान में सरकारें शमशान और क़ब्रिस्तान व हमारे सैनिकों की शहादतों पर बन जाती थी क्या इनको पूरा मौक़ा मिलना चाहिए? अरमान अधूरा नही रहना चाहिए।

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इस विचारधारा पर चलने वाले हिन्दू मुसलमान करना बहुत अच्छा जानते है बाक़ी कुछ नही छह साल में यही अनुभव हुआ नोटबंदी कर देश की अच्छी खांसी अर्थव्यवस्था को पटरी से उतार दी बिना सोचे समझे लगाई गई जीएसटी ने व्यापार चौपट कर दिया रही सही कसर देश में चार घंटे के नोटिस पर देशबंदी ने पूरी कर दी विदेश नीति की हालत क्या हो गई यह भी सबके सामने है सरकार में आने से पहले लाल लाल आँख दिखाने की बात करते गोली बोली साथ नही चलेगी बिना बुलाए पाकिस्तान चले जाते है नवाज़ शरीफ़ की बिरयानी खाने चलो पाकिस्तान और चीन की बात छोड़ देते है वह तो हमारे दुश्मन देश है नेपाल जिसके साथ हमारे रोटी और बेटी के रिसते थे वह भी हमें लाल आँख दिखा रहा है यही हाल बांग्लादेश का है जिसको बनाने में हमारा योगदान है श्रीलंका, भूटान सब पड़ोसी देश चीन के पाले जाते दिख रहे है और चीन हमारी सीमाओं में घुसपैठ कर रहा है और हम कह रहे है कि ना कोई हमारी सीमा में घुसा है ना कोई घुसा हुआ है और ना ही किसी ने हमारी किसी पोस्ट पर क़ब्ज़ा किया है।

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नोटबंदी करने के बाद पचास दिन माँगे देशबंदी के लिए 21 दिन माँगे ना पचास दिन में कुछ हुआ ना 21 दिन में कुछ हुआ नोटबंदी के बाद पचास के बाद किसी चौराहे की बात की थी जो आज तक नही मिला उस पर क्या होना था सबको मालूम है।बेरोज़गारी का क्या आलम है यह भी सबके सामने है दो करोड़ लोगों का रोज़गार छिन्न गया और भी छिनने की क़तार में लगे है ये फ़र्क़ है सबको साथ लेकर चलने वाली विचारधारा में और धार्मिक आधारित विचारधारा में फ़ैसला आपको करना है।एक बात तो है झूठ बड़ी मज़बूती और आत्म विश्वास के साथ बोलते है इनको सुनने के बाद सच बोलने की प्रेरणा मिलती है।
तू इधर-उधर की बात ना कर, ये बता कि कारवां क्यों लुटा।

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मुझे रहजनों से गिला नही तेरी रहबरी पर मलाल है।

क्यों मोर नाचा तेरे आंगन में, क्यों बतखों का है नाच हुआ।

क्यों मजदूर लुटा,क्यों किसान लुटा, क्यों देश बेचने का कारोबार हुआ।

क्यों अर्थव्यवस्था बौनी हुई, क्यों सपनों का संसार लुटा।

क्यों बेरोजगारी बढ़ रही,क्यों दोष नेहरू और भगवान को मिला।

देश की सम्पदा बेचकर, तू क्यों ना अभी तक भी शर्मसार हुआ।

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