Sunday , October 2 2022

संविधान, अम्बेडकर और गांधी


गांधी और अम्बेडकर का संवाद समीकरण आजादी के पहले के भारत का महत्वपूर्ण परिच्छेद है। गांधी की विशालता थी। बड़े बौद्धिक मतभेदों के रहते भी अम्बेडकर को देश हित में भूमिका सौंपी। उसके बिना गांधी का अहंकार सुरक्षित रह सकता था। लेकिन देश को अपनी बुनियाद पर खड़ा होने में आजादी के बाद कई अज्ञात खतरों से खेलना पड़ता।

यह भी पढ़ें : एक स्कूल ऐसा जहाँ 12 बरस से मुस्लिम शिक्षक पढ़ा रहा भगवत गीता

संविधान सभा की एक एक उपपत्ति पर अंबेडकर के जवाब जिस साफगोई, बौद्धिक सचेष्ठता और भविष्यमूलक भाषा में लिखे गए-वह नए भारत के इतिहास का कालजयी दस्तावेज है। यह गांधी थे जिनके आग्रह पर अंबेडकर को संविधान सभा में सम्मानजनक ढंग से शामिल किया गया। गांधी और अंबेडकर दोनों की दुर्गति यही है कि दोनों के शिष्य या तो अंधश्रद्धा के कायल हैं अथवा उनकी उपेक्षा करते हैं। अंबेडकर मुख्यतः दिमाग थे और दलित के लिए दिल भी। वे भावनाओं को तर्क की जुबान में परोसने के भारतीय संविधान सभा के सबसे प्रखर प्रवक्ता थे। संविधान सभा में गांधीजी की मदद से जीतकर पहुंचे थे। वह उदार नेताओं का दौर था। इतिहास ने सिद्ध किया गांधी का फैसला देश और भविष्य की भलाई का था। अम्बेडकर नहीं होते तो करीब दो वर्षों में उनकी प्रतिभा के बिना आईन की आयतों के चेहरे के कंटूर स्थिर नहीं किये जा सकते थे।

गांधी सोचते थे कि समाज के कथित उच्च वर्गों का दायित्व है कि वे दलितों को सामाजिक रूप से सक्षम बनाने में आगे बढ़ें। विवेकानन्द और गांधी के अपने अनोखे और पुरअसर तर्क थे कि जाति प्रथा और वर्णाश्रम व्यवस्था के कुछ सकारात्मक पक्ष भी हैं। उन्हें ठीक से समझा नहीं गया है। अंबेडकर ने इस तर्क को कतई मंजूर नहीं किया। उन्होंने जाति प्रथा की सड़ी गली सामाजिक रूढ़ि के खिलाफ जेहाद करने का बिगुल फूंका। अंबेडकर ने राजनीति में धर्म के प्रयोग को लेकर पाकिस्तान बनने और सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका को देखा था और गांधी की हत्या को भी। एक अनीश्वरवादी आध्यात्मिक दर्शन ही अम्बेडकर के अनुसार संविधान का पाथेय हो सकता है। उनका यह उत्तर-आधुनिक सोच अब तक बहस के केन्द्र में नहीं आया है। यह जानने में रोमांचकारी लगता है कि डाॅं0 अम्बेडकर ने ही उद्देशिका में देश के प्रतिबद्धित संकल्प को ’ ईश्वर के नाम पर ’ घोषित करने की अपील की थी, लेकिन सदन में गर्मागर्म बहस के बाद उनके प्रस्ताव को 41 के मुकाबले 68 वोटों से खारिज कर दिया गया था। यही अम्बेडकर बाद में नास्तिकता के बौद्ध धर्म में अन्तरित हो गए।

यह भी पढ़ें : कौन है गुनहगार भारत बँटवारे का ?

अम्बेडकर गांधी की सियासी दृष्टि से संविधान निर्माण के कायल तो क्या विरोधी रहे। सविनय अवज्ञा, धरना, सिविल नाफरमानी, असहयोग, जन आंदोलन और हड़ताल जैसे निष्क्रिय प्रतिरोध के गांधी हथियारों का अपनी कानूनी निष्ठा के कारण विरोध किया। उनकी संवेदना लेकिन एक मुद्दे पर चूक गई। उन्होंने कहा किसी को सरकार से शिकायत हो तो सीधे उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में दस्तक दे सकता है। सड़क आंदोलन की क्या जरूरत है। इंग्लैंड के परिवेश में ऐसा होता रहता है। उस छोटे गोरे देश के मुकाबले भारत जैसे बड़े गरीब, बहुल जनसंख्या वाले महादेश में औसत हिन्दुस्तानी के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाना आसमान के तारे तोड़ने जैसा सिद्ध होता है। खस्ताहाली को भी लूटने वाले वकीलों की फीस, जजों की कमी, नासमझी, चरित्रहीनता और ढिलाई तथा मुकदमों की मर्दुमशुमारी से परेशान पूरी व्यवस्था के रहते अम्बेडकर के आश्वासन के बाद जनता का भरोसा बुरी तरह कुचल दिया गया है।

ग्राम स्वराज पर आधारित गांधी की प्रस्तावित शासन व्यवस्था की भी अम्बेडकर ने खिल्ली उड़ाई। उनके आग्रह के कारण शहर आधारित, विज्ञानसम्मत और उद्योग तथा कृषि की मिश्रित अर्धसमाजवादी व्यवस्था का पूरा ढांचा नेहरू के नेतृत्व में खड़ा हुआ। बाबा साहेब के अनुसार हमारे गांव गंदगी, अशिक्षा और नादान समझ के नाबदान रहे हैं। वे नहीं मानते थे कि गांव प्राचीन गणतंत्र की मशाल रहे होंगे। गांधी के खिलाफ कहते थे। संविधान सभा में गांधी की समझ अम्बेडकर ने नहीं सुनी। अम्बेडकर के कारण ग्राम पंचायतों का गठन मौलिक अधिकार के परिच्छेद में नहीं रखा जा सका। वह कमी राजीव गांधी ने अपने कार्यकाल में पूरी की। उसका अमल नरसिंहराव के कार्यकाल में हो सका।

अम्बेडकर ने उन सदस्यों को आड़े हाथों लिया था जिन्होंने भावावेश में संसदीय बहस में यहां तक कह दिया था कि पंचायती राज की व्यवस्था संविधान सभा में नहीं हो सकती तो वे केन्द्र तथा राज्य सरकारों का गठन भी नहीं चाहते। अम्बेडकर ने कहा कि भारतीय गांवों ने भले ही विदेशी आक्रमणकारियों के हमले झेले होंगे, परन्तु उन्होंने लगभग शुतुरमुर्ग की प्रवृत्ति का परिचय दिया और किसी तरह जीवित रहे भर हैं। अम्बेडकर ने बेलाग होकर यह कहा कि यह कथित ग्रामीण गणतंत्र भारत की बरबादी रहे हैं। अम्बेडकर ने प्रतिरोधी उत्साह के साथ यहां तक कह दिया कि उन्हें इस बात की प्रसन्नता है कि संविधान के प्रारूप में गांधी के गांवों की बुनियादी इकाइयों के रूप में उपेक्षा की गई है और उसके बदले व्यक्तियों को इकाई बनाया गया है।

यह भी पढ़ें : इस निरीह आदमी से आपके धर्म को क्या और क्यों खतरा है?

अम्बेडकर और गांधी एक दूसरे के प्रबल विरोधी लेकिन परिपूरक हैं। दलितों के अलग निर्वाचन क्षेत्र को लेकर गांधी और अंबेडकर में समझ विकसित नहीं होती तो आजादी मुल्तवी हो सकती थी। सवर्ण होकर भी गांधी के मन में दलितों के लिए अंबेडकर की तरह पीड़ा थी। अंबेडकर इस तरह की सहानुभूति के कायल नहीं थे। वे दलितों को योग्य बनाकर बराबरी के हक के पक्ष में थे। उनमें व्यग्रता थी। गांधी में धीरज था। गांधी ईसाइयत के आध्यात्मिक मूल्यों से परहेज नहीं करते थे। अंबेडकर यूरोप की बौद्धिक प्रतिभा के पक्षधर और आयातक थे। अंबेडकर में तल्खी थी लेकिन अंदर कहीं करूणा का सैलाब था। गांधी पूरी तौर पर करुणामय थे। गांधी का अतिआदर्शवाद धीरे धीरे धीमा होकर अव्यावहारिक बनाया जा रहा है। अंबेडकर वोट बैंक की राजनीति के चलते अपने सियासी जुमलों के करण हर पार्टी के लिए मुफीद हैं। लेकिन अमल में लाने से गले की हड्डी बनते दिखाई देते हैं।

यह भी पढ़ें : रमजान के महीने में स्कूलों को लेकर सऊदी अरब का बड़ा फैसला

गांधी केवल राजनीतिक स्वाधीनता के पक्ष में नहीं थे। उनकी भारत के लिए पंचायत राज अथवा ग्रामीण गणराज्य पर आधारित स्वराज की महत्वाकांक्षा थी। संसदीय पद्धति के शासन से उन्हें अपने बुनियादी सोच के प्रारम्भ से ही असहमति रही है। संविधान सभा की बुनियादी बहस में अनेक विषय आये, परन्तु जिस पंचायत राज के आधार पर भारत में स्वराज-शक्ति का पिरामिड बनाया जाना चाहिए था, दुर्भाग्यवश उसे ही अम्बेडकर व्याख्यायित और आख्यायित करना भूल गये। संविधान सभा में 4 से 9 नवम्बर 1948 के बीच पंचायत व्यवस्था की उपेक्षा को लेकर एक जीवन्त बहस हुई। अनेक सदस्यों ने महात्मा गांधी का उद्धरण देते हुए कठोर स्वरों में यह तर्क रखा कि जब तक संविधान में पंचायत व्यवस्था पर आधारित स्वराज्य की परिकल्पना की प्रतिबद्धता परिभाषित नहीं की जाती तब तक संविधान की रचना का ही कोई अर्थ नहीं है।

PLEASE ACKNOWLEDGE

وائس آف مسلم مسلمانوں اور غیر مسلموں تک اسلام کا پیغام پہنچاتی رہی ہے۔ اس کا مقصد لوگوں کو اسلام کی حقیقت سے متعلق خبروں اور صحیح اسلامی پیغام سے آگاہ کرنا ہے
We are relying principally on contributions from readers and concerned citizens.
برائے کرم امداد کریں! Support us as per your devotion !
www.voiceofmuslim.in (since 2017)
Account Details-
Acount Name :- VOICE OF MUSLIM
Bank Name :- STATE BANK OF INDIA
A/c No. :- 39107303983
IFSC CODE : – SBIN0005679
PAYTM MOBILE NO. 9005000008
Please share this message in community and be a part of this mission

About Voice of Muslim

SUPPORT US

Powered by themekiller.com anime4online.com animextoon.com apk4phone.com tengag.com moviekillers.com