Tuesday , August 4 2020

क्या कांग्रेस को छोड़ नई कांग्रेस के गठन पर विचार का वक़्त आ गया ?

TAUSEEF QURESHI

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अंदर भी संकट का दौर चल रहा है। कहते है जब बुरा दौर चल रहा होता है तो ऊँट पर बैठे हुए कुत्ता काट लेता है इस लिए बहुत फूंक-फूंक कर क़दम रखना पड़ता है और यह सही भी है रखना भी चाहिए। ख़ैर जब मोदी की भाजपा सरकार चारों ओर से घिरी हुई नज़र आ रही है हर तरफ़ तरही-तरही है जनता कांग्रेस की वापसी पर विचार करने को विवश लग रही है इसमें कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी द्वारा मोदी सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में कोई कोर कसर नही छोड़ रहे ऐसा में पूरी कांग्रेस को राहुल गाँधी के पीछे लामबंद होना चाहिए लेकिन नही वहाँ तो एक दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ मची है वरिष्ठ कांग्रेसियों द्वारा जो टांग खिंचाई की जा रही है उसका जनता में ग़लत संदेश जा रहा है जो कांग्रेस के भविष्य के लिए ठीक नहीं है अब सवाल उठता है कि क्या हमेशा वरिष्ठों ने कांग्रेस को कमज़ोर करने का काम किया ? कांग्रेस की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसके अंदर ही मौजूद साँप नही अजगरों ने कांग्रेस और उसकी की विचारधारा को निगल लिया।

राजनीतिक विशेषज्ञ का मानना है कि उसके अंदर RSS की विचारधारा को पसंद करने एवं उस पर काम करने वाले मौजूद है जो हिन्दुस्तान के राजनीतिक भविष्य राहुल गाँधी को मंज़ूर नही यही वजह है कि उसकी राह में रोड़े डालने में कोई कमी नही छोड़ी जा रही है जबकि राहुल गाँधी यह साफ़ कर चुके है किसी ओर पर निशाना साधते हुए कि मेरा राजनीतिक भविष्य चाहे ख़त्म हो जाए लेकिन मैं झूठ की राजनीति नही करूँगा और न ही झूठ बोलूँगा राहुल गाँधी के इस बयान के बाद जनता में एक अलग ही संदेश गया झूठ के इस दौर में अगर कोई सच की बात करे तो उसका सकारात्मक संदेश जाना ही है जनता इस पर चर्चा कर रही कि राहुल गाँधी सच की राजनीति करना चाहते है लेकिन कांग्रेस के बुजुर्ग हो चुके नेता उन्हें अपने पुराने ढर्रे पर चलाना चाहते और उन्हें यह मंज़ूर नही है।

जिन्होंने कांग्रेस की भट्टी पर चढ़ी कढ़ाई से दूध नही मलाई मलाई खाकर अपने आपको पाला पोसा है बल्कि मृतक आश्रितों को भी आगे बढ़ाने का काम किया आज वहीं उसमे कमियाँ निकाल कांग्रेस को कमज़ोर करने का प्रयास कर रहे है अब देखना यह है कि क्या हिन्दुस्तान का राजनीतिक भविष्य इनकी महत्वकांक्षाओं के चलते हार मान लेगा या अपने सिद्धांतों पर चलते हुए उनको अपने ही सिद्धांतों पर चलने के लिए मजबूर कर देगा।वैसे तो राहुल गाँधी के सक्रिय होने बाद से ही कांग्रेस में उनकी टांग खिंचाई शुरू हो गई थी जो अब मंजरे आम पर आ गई लगता है अब या तो कांग्रेस इससे भी बुरा दौर आएगा या कांग्रेस और उसकी विचारधारा इन वरिष्ठों के मकड़जाल से बाहर निकल निखर कर सामने आएगी और ऐसा जब हो सकता है जब सोनिया, प्रियांका व राहुल गाँधी एक साथ मज़बूत और पक्का मन कर इस कांग्रेस को इन्हीं पुराने कांग्रेसियों को सौंपकर नई कांग्रेस का गठन करे अपनी दादी आर्यन लेडी पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्रीमती इंदिरा गाँधी की तरह जब कुछ हो सकता है नहीं तो ये संघ विचारक कांग्रेसी पार्टी को अपने पैरों पर खड़ी नही होने देंगे।

कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी द्वारा के राज्यसभा सांसदों के साथ वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए बैठक ले रही थी इसी बीच कुछ सांसदों जिसमें पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, पीएल पुनिया, राजीव सातव रिपुन वोरा एवं छाया शर्मा जैसे सांसदों ने राहुल गाँधी को फिर से पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की माँग की उनका तर्क था कि देश के मौजूदा सियासी हालात का सामना राहुल गाँधी जिस मज़बूती के साथ सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभा रहे है उससे साफ़ हो जाता है राहुल को पार्टी की कमान सौंप देनी चाहिए। वह मोदी सरकार की नकारात्मक नीतियों को जनता के बीच रख रहे है जबकि आज देश में मोदी सरकार के सामने खड़े होने की किसी भी पार्टी अथवा नेता की हिम्मत नही हो रही है लेकिन राहुल गाँधी सीना ठोंककर मोदी सरकार की जनविरोधी नीतियों का विरोध कर और मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे है। इसके बाद बुज़ुर्ग कांग्रेसी राज्यसभा के सांसद पूर्व केन्द्रीय मंत्री पी चिदंबरम, कपिल सिब्बल एवं आनन्द शर्मा आदि जैसे सरीखे नेताओं ने पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाते-लगाते उनका दर्द छलक गया उन्होंने कहा कि वेणुगोपाल और सातव को राज्यसभा में भेजने का फ़ैसला राहुल गाँधी ने किसकी सलाह पर लिया और किस हैसियत से लिया मामला यही नही रूका राहुल गाँधी द्वारा ट्विटर पर मोदी सरकार से सवाल पूछने को भी ग़लत क़रार दिया राहुल विरोधी कांग्रेस नेताओं का कहना था कि हमें नही पता राहुल गाँधी को सवाल पूछने की सलाह कौन देता है उसे विदेश नीति एवं रक्षा नीति का क्या ज्ञान है।

इनका यह भी तर्क था कि इस तरह के सवालों से पार्टी को कोई फ़ायदा नही हो रहा है।वह यही नही रूके उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी के क़रीबी ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे ही पार्टी को कमज़ोर कर रहे है इन हालात में पार्टी की कमान यदि राहुल गाँधी के हाथ में दे भी दी तो वह पार्टी को कैसे सँभालेंगे इसकी क्या गारंटी है कि उनकी टीम के सदस्य आगे मोदी की भाजपा में नही जाएँगे यह सब सोनिया गाँधी की मौजूदगी में ही हो रहा था। राहुल विरोधियों के द्वारा पहली बार सार्वजनिक रूप से राहुल गाँधी का विरोध किया यह सब होता देख कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष त्याग की मूर्ति सोनिया गाँधी ख़ामोशी अख़्तियार किए रही लेकिन राहुल गाँधी के हामी सांसद ख़ामोश नही रहे उन्होंने बुजुर्गों पर यूपीए 2 में ख़राब प्रदर्शन को हथियार बनाते हुए पार्टी को इस हालत में लाने का ज़िम्मेदार बता दिया उन्होंने कहा कि यूपीए दो में आप सरकार में मंत्री थे इसके बाद भी पार्टी को नुक़सान हुआ जिसका ख़ामियाज़ा पार्टी अभी तक भुगत रही है।

इस बैठक में पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष ग़ुलाम नबी आज़ाद, पार्टी के कोषाध्यक्ष रणनीतिकारों में शामिल अहमद पटेल पूर्व रक्षा मंत्री ए के एंटनी जिन्होंने पार्टी की 2014 में हुई हार के बाद बनी जाँच कमेटी की रिपोर्ट देते हुए कहा था कि पार्टी की हार मुस्लिम तुष्टिकरण की वजह से हुई है जबकि वह यह नही बता पाए थे कि क्या मुस्लिम तुष्टिकरण किया गया है मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप संघ एवं भाजपा के नेताओं का एक षड्यंत्र था बहुसंख्यकों को बहकाने का जिसमें वह कामयाब रहे और अब तक भी है जिसे एंटनी कमेटी ने मज़बूती दी थी उन्होंने भी संघ के दृष्टिकोण को सही क़रार दे दिया था जिसे किसी भी नज़रिये से सही नही कहा जा सकता था मुसलमान को कांग्रेस ने नुक़सान के सिवा कुछ नही दिया इसके बाद भी मुसलमान पूरी इमानदारी दयानत दारी से कांग्रेस के साथ खड़ा रहा एंटनी उन तथ्यों को उजागर नही कर पाए थे जिनकी वजह से यूपीए दो को नुक़सान हुआ जैसे केन्द्रीय गृह सचिव आर के सिंह मोदी की भाजपा के लिए काम कर रहे थे यूपीए दो ने उन्हें केन्द्रीय गृह सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर बिठा रखा था जो रिटायर होने पर मोदी की भाजपा में शामिल हुआ आज भाजपा से सांसद है।

RSS के मुख्यालय नागपुर में हाजरी लगाने वाले सतपाल सिंह मुम्बई पुलिस कमिश्नर के पद पर विराजमान थे सरकार कांग्रेस की थी ऐसे और भी कई नाम है जो यूपीए दो में मोदी की भाजपा के एजेंट के रूप में काम कर रहे थे लेकिन संघ विचारधारा के हामी कहने को कांग्रेसी ख़ामोशी की चादर ओढ़े सत्ता का आनन्द ले रहे थे पार्टी को बर्बादी के कगार पर पहुँचा रहे थे एंटनी ने उनको निशाना नही बनाया था जो RSS चाहता था वही रिपोर्ट दी थी बैठक में एंटनी भी शामिल थे लेकिन यह ख़ामोश रहे दोनों की तरफ़ से नहीं बोले।अहमद पटेल ने 37 सालों बाद आई शिक्षा नीति पर अपने सुझाव रखे। पूर्व गृहमंत्री रहे पी चिदंबरम ने ज़मीनी स्तर पर पार्टी के कमज़ोर होते संगठन पर भी चिंता जताई लेकिन यूपीए के दस साल के शासनकाल में संगठन के लिए क्या किया इस पर कुछ नही बताया यूपीए एक और दो का यह हाल था कि पार्टी के कार्यकर्ताओं की कोई हैसियत नही थी दोनों कार्यकाल में शामिल मंत्रियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है ना यह था कि यह कमज़ोर क्यों और किस कारण से हुआ जिस राज्य में पार्टी का संगठन कमज़ोर था वहाँ के लोगों को बुलाकर कितनी बार चर्चा की गई यूपी की बात करे तो पिछले तीन दसको से पार्टी वेंटिलेटर पर चल रही है इसके बावजूद कहने को इन बड़े और सरीखे नेताओं ने क्या और क्यों प्रयास नहीं किए इसका कोई जवाब नहीं है जबकि यूपी ने यूपीए दो को इसी वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस ने 22 सांसद दिए थे उसके बाद भी यूपी पर कोई ध्यान नही दिया गया जबकि यूपी के नेता भी केन्द्र में मंत्री थे तब कुछ नही किया गया यूपी में अब आकर पार्टी महासचिव यूपी प्रभारी श्रीमती प्रियांका गाँधी मेहनत कर रही है जिसका असर साफ़ देखा जा सकता है। कपिल सिब्बल ने पार्टी में सभी को अपनी-अपनी समीक्षा करने की ओर इसारा किया।संगठन को मज़बूत बनाने के लिए ज़ोर आज़माइश करने की ज़रूरत है न कि पार्टी का अध्यक्ष बनाने की।राहुल गाँधी फिर से अध्यक्ष नही बनना चाहतें हैं।

2019 के आमचुनाव में कांग्रेस को अपेक्षा से बहुत कम सीटें मिली थी बल्कि पार्टी की करारी हार हुई थी जिसकी ज़िम्मेदारी लेते हुए पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देते हुए कहा था कि गाँधी परिवार से पार्टी का कोई अध्यक्ष नही होगा कांग्रेसियों की लाख मान मनोव्वल के बाद भी राहुल गाँधी नही माने थे इनके अलावा भी अन्य कोई आगे नही आया था जिसके बाद सोनिया गाँधी को ही अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था जो अभी तक है।परमानेन्ट अध्यक्ष बनाने की माँग के चलते ही राहुल गाँधी का नाम फिर आगे किया जा रहा था जिसमें बुजुर्गों ने टांग मार दी है।सियासी जानकारों का कहना है राहुल गाँधी सिद्धांतवादी नेता है अब वह पार्टी का पुनः अध्यक्ष नही बनना चाहेंगे। इन वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं का यह भी आरोप है कि राहुल प्रियांका गाँधी सोनिया गाँधी की भी बात नहीं सुनते है।मनीष तिवारी ने भी पार्टी से चार सवाल किए है पहला सवाल क्या 2014 के आमचुनाव में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन लिए यूपीए दो की सरकार की नीतियाँ ज़िम्मेदार थी दूसरा क्या यूपीए के अंदर ही साज़िश रची गई थी तीसरा 2019 के आमचुनाव की भी समीक्षा होनी चाहिए चौथा सवाल पिछले छह साल में यूपीए पर किसी तरह का आरोप नही लगाया गया। पूर्व केन्द्रीय मंत्री मनीष तिवारी ने कहा कि यूपीए सरकार ने सूचना का अधिकार खाद्य सुरक्षा क़ानून और शिक्षा का अधिकार जैसे जनता के लिए अच्छे क़ानून बनाए। ऐसे में अगर मूल्यांकन करना है तो इसका भी होना चाहिए कि यूपीए सरकार पर जो ग़लत लांछनों की बारिश की गई उस सियासी षड्यंत्र में कौन-कौन वरिष्ठ या कनिष्ठ शामिल थे।

उन्होंने तत्कालीन सीएजी विनोद राय की क्या मंशा थी इसकी भी समीक्षा होनी बेहद ज़रूरी है कि इतनी उपलब्धियों के बाद भी हम क्यों 2014 हार गए इसके बाद मोदी की झूट पर आधारित सरकार 2019 में भी क्यों जीत गई और हम क्यों हार गए।यूपीए ने बर्बाद कर दिया यह कहना ग़लत है। यूपीए पर जो कीचड़ उछाला गया था वह सब षड्यंत्रकारी की देन था।इन्हीं सब आरोप प्रत्यारोपों के चलते कांग्रेस को ऑक्सीजन दिया जा रहा है जबकि सामने झूठ का महल बनाने वाला है इसके बावजूद भी कांग्रेसी अपने पुराने ढर्रे से बाहर आने को तैयार नही है। सोनिया राहुल प्रियांका गाँधी कांग्रेस को खड़ी करने के चाहे जितने गंभीर प्रयास कर ले लेकिन कांग्रेस के ये बुज़ुर्ग और युवाओं की लड़ाई उन तीनों के संयुक्त प्रयास को पलीता लगा रही है इस आपसी खींच तान के क्या नतीजे निकल कर आएँगे यह तो आनेवाले दिनों में पता चलेगा जिसे हम भी देखेंगे और आप भी देखेंगे।

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