Monday , August 3 2020

मुसलमान वोटर निर्णायक होंगे यूपी के राजनैतिक भविष्य में

Tausif Qureshi

राज्य मुख्यालय लखनऊ। यूपी की सियासत में शह और मात का खेल शुरू हो गया है हालाँकि अभी यूपी चुनाव बहुत दूर है लेकिन सियासी दलों ने चुनावी बिसात बिछाने के लिए अपने चुनावी तरकश से तीर चलाने प्रारंभ कर दिए है मोदी की भाजपा को छोड़ कांग्रेस ,बसपा एवं सपा के वोटों को चुनावी ख़ज़ाने में समेटने के लिए उनके निशाने पर मोदी की भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार तो है ही साथ ही वह यह नाप तौल रहे कि आगामी 2022 का विधानसभा चुनाव किसके सहारे जीता जा सकता है इस लिए वह कोई मौक़ा नही छोड़ना चाहते जिससे उनके वोटबैंक में इज़ाफ़ा होता हो ज़ाहिर सी बात है सियासत में इसको बुरा भी नही समझा जाता क्योंकि सबका लक्ष्य सत्ता पाना होता है जो ग़लत भी नही है सियासी दल होते ही इस लिए है।

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आठ पुलिस वालों की हत्या करने वाला विकास दूबे डायरेक्ट तो नही लेकिन किन्तु परन्तु कर आजकल सियासी दलों का दुलारा बना हुआ है सियासी दलों के नेताओं के किन्तु परन्तु का ब्राह्मण समाज भी उनकी हाँ में हाँ मिला रहा है ये बहस अलग है कि वह सही है या ग़लत हमारा मक़सद किसी को ग़लत या सही का सर्टिफिकेट देना नही है और होना भी नही चाहिए उनके अपने तर्क है कि हमारे समाज का उत्पीडन हो रहा है जो सही भी हो सकता है और ग़लत भी।

मुसलमान वोटर

ख़ैर हम बात कर रहे थे सियासी दलों के आगामी विधानसभा चुनाव 2022 की तैयारियों की फ़िलहाल तीन वोटबैंक ऐसे है जिनको सियासी दल अपने-अपने पाले में लाने के प्रयास में जुटे हैं मुसलमान, ब्राह्मण और दलित कांग्रेस का लक्ष्य मुसलमान, ब्राह्मण और दलित तीनों को वापिस कांग्रेस में लाने का है इसके के लिए वह जी-तोड़ प्रयास कर रही है। देखा जाए तो मुसलमान को कहा जा सकता है कि वह कांग्रेस की तरफ़ मूव कर जाए। यूपी का मुसलमान सपा की लीपा-पोती से थक चुका है और वह कांग्रेस का पूर्व में वोटर भी रहा है। इससे इंकार नही किया जा सकता है। यही बात ब्राह्मणों पर भी लागू होती है। वह भी उसका मूल वोटबैंक हुआ करता था। वह तो हिन्दू मुसलमान के मकड़जाल में फँस कर अपनी पार्टी को छोड़ भटकता फिर रहा है, कभी वह बसपा का तारण हार बन जाता है तो कभी वह मोदी की भाजपा की चुनावी नाव में सवार हो उसकी नैय्या पार लगा देता है। परन्तु कांग्रेस के बाद उसका कोई स्थायी सियासी आवास नही बन पाया है।  इसलिए कहा जा सकता है कि शायद वह अपने सियासी स्थायी घर की तलाश में है और ऐसा हो भी सकता है कि वह कांग्रेस के घर में प्रवेश कर जाए, लेकिन दलितों को लेकर फ़िलहाल क़यास भी नही लगाए जा सकते है, क्योंकि दलितों पर बसपा का जादू सर चढ़कर बोलता है। इसमें किसी को कोई शक भी नही है इसकी वजह भी है जबसे दलित बसपा के साथ जुड़ा है। उसमे आज तक कोई टूट नही हुई, हर चुनाव में मज़बूती के साथ बसपा के साथ खड़ा रहा। ये बात अपनी जगह है कि उसको पिछले दो चुनाव से अपेक्षाकृत कामयाबी नही मिली। इसके बावजूद वह वही खड़ा है। यही वजह है कि दलितों के वोटबैंक में सेंधमारी की बात सियासी गुणाभाग के पंडितों की समझ में नही आती। हाँ यह बात अलग है कि प्रयास सियासी दल करते ही है। कामयाबी मिलती है या नही यह सब चुनाव के बाद में समीक्षा का विषय है। दलित भी बसपा से पूर्व कांग्रेस का ही वोटबैंक रहा है।

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हालाँकि कांग्रेस अपने 135 साल के लंबे दौर में सबसे ख़राब दौर से गुजर रही है। उसके नौजवान सितारे आने वाले कल के भविष्य एक-एक कर अपनी महत्वकांक्षा के चलते या कांग्रेस हाईकमान की उदासीनता के चलते साथ छोड़ मोदी की भाजपा का दामन थाम रहे है। कांग्रेस का इस पर कहना है कि उनको भविष्य की नही वर्तमान की चिंता है, जो जाने का मन बना चुका हो उसको रोका नही जा सकता। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एनएसयूआई की बैठक को संभोधित करते हुए कहा कि इस तरह के नेताओं के जाने से नए युवाओं के लिए रास्ते खुलेंगे। इस तरह के सख़्त बयान से एक बात तो साफ हो गई कि कांग्रेस आलाकमान इस तरह की धमकियों से डरने वाला नही है और हो सकता है कि वह और भी कई बहुत सख़्त निर्णय ले यह तो आने वाला समय बताएगा।

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यूपी चुनाव 2022 के शुरू में होंगे बसपा भी अपने पत्ते फ़ेट रही है उसके सियासी तरकश से चुनावी बिसात बिछाई जा रही है उसकी रणनीति में ब्राह्मण एवं मुसलमान वोटबैंक है सियासी पंडितों और बसपा के रणनीतिकारों का मानना है कि इससे पूर्व भी ब्राह्मणों ने बसपा को वोट देकर सत्ता की दहलीज़ पर पहुँचाया था। यह 2007 के विधानसभा चुनाव की बात है। उसी रणनीति पर चलते हुए बसपा की सुप्रीमो मायावती ने कानपुर के बिकरू गाँव में डीएसपी सहित आठ पुलिस वालों की हत्या करने का मुख्य आरोपी विकास ने मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक मंदिर के अंदर सरेंडर किया था। उसके बाद कानपुर लाते समय योगी की पुलिस ने योजनाबद्ध तरीक़े से एनकाउंटर कर दिया था। इस तरह के एनकाउंटरों पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए थे। सवाल सही खड़े किए थे या एनकाउंटर सही थे, यह तो विपक्ष की माँग के अनुसार मौजूदा जज से जाँच कराई जाए, जब साफ़ हो पाएगा कौन ग़लत है और कौन सही इस घटना के बाद मारे गए विकास दूबे को लेकर सियासी दलों ने योगी सरकार की ठोंक दो की नीति पर सवाल खड़े कर इस मामले को ब्राह्मणों पर अत्याचार का रूप दे दिया था। इसमें सबसे पहले बसपा की सुप्रीमो मायावती थी जिसने योगी सरकार पर ब्राह्मणों को प्रताड़ित करने का आरोप लगाया था। मायावती ने कहा था कि प्रदेश की योगी सरकार ऐसा संदेश न दे जिससे ब्राह्मण समाज अपने आपको असुरक्षित, भयभीत और आतंकित समझने लगे मायावती यही नही रूकी उन्होंने कहा कि प्रदेश में आपराधिक पर्वती के लोगों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे अभियान की आड़ में छाँट-छाँट कर दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को निशाना बनाया जा रहा है, जो मोदी की भाजपा की सियासत के फ़्रेम में फ़िट बैठता है उसी घिनौनी सियासत से जुड़ा होना लगता है।

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मायावती के इस रूख से यह साफ हो जाता है कि वह एक बार फिर ब्राह्मण समाज और मुसलमान का पूर्व की भाँति समर्थन चाहती है जैसा उसे 2007 के विधानसभा चुनाव में मिला था उस चुनाव के बाद बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी उस सरकार में सबसे अधिक बसपा के ब्राह्मण विधायक जीते थे जिनकी संख्या 41 थी बसपा ने इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया था जबकि सपा से 11 , भाजपा से 3 , कांग्रेस से 2 व 1 अन्य था। आगामी विधानसभा चुनाव में सही मायने में तो ढेढ साल बचा है लेकिन असल में मात्र एक वर्ष ही है छह महीने पहले तो टिकटों की लड़ाइयाँ एवं गठबंधनों का दौर शुरू हो जाता है। अन्य दलों का प्रयास है किसी तरह ब्राह्मण, मुसलमान और दलित हमारे पाले में आ जाए। मायावती का यह प्रयास सियासी पंडित इसी नज़रिये से जोड़ कर देख रहे है उनका मानना है कि मायावती अपनी सोशल इंजीनियरिंग को बहाल कर सत्ता की दहलीज़ तक पहुँचने का प्रयास कर रही है। आगामी चुनाव को लेकर बसपा की रणनीति तय की जा रही है लोकसभा में संसदीय दल का नेता भी पंडित को बनाया गया है और राज्यसभा में भी पंडित ही संसदीय दल का नेता है लोकसभा में पूर्व सांसद राकेश पांडेय के पुत्र अम्बेडकर नगर सीट से बसपा सांसद रितेश पांडेय जो 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार विधायक निर्वाचित हुए थे 2019 के लोकसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव लड़े और सांसद निर्वाचित हो गए थे वहीं राज्यसभा में सतीश मिश्रा को बनाया गया है। यहाँ यह भी ग़ौरतलब है कि बसपा में पहली बार किसी दूसरे ब्राह्मण नेता को तर्जी देकर अहम पद दिया गया है इससे पहले सतीश मिश्रा के अलावा किसी दूसरे ब्राह्मण को अहमियत नही दी जाती थी यूपी प्रदेश अध्यक्ष पद पर मुस्लिम चेहरा पूर्व राज्यसभा सांसद बाबू मुनकाद अली को बनाया गया है साफ़तौर पर कहा जा सकता है कि यह बसपा की 2022 की चुनावी तैयारी है।

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अब देखने वाली बात यह है कि क्या मायावती 2007 दोहरा पाएँगी या यह सब तैयारियाँ धरी की धरी रह जाएगी यह तो वक़्त ही बताएगा लेकिन बसपा की चुनावी तैयारियों से कांग्रेस और सपा को सबसे ज़्यादा नुक़सान होने की संभावनाओं से इंकार नही किया जा सकता है अगर उसकी सोशल इंजीनियरिंग फ़िट बैठती है।सपा के मालिक अखिलेश यादव इस ख़ुशफ़हमी का शिकार हो रहे है कि जनता मोदी की भाजपा की योगी आदित्यनाथ की सरकार की जनविरोधी नीतियों का लाभ सपा को ही मिलेगा जबकि सपा से मुसलमान भी किनारा कर सकता है अगर ऐसा हुआ तो सपा बहुत ही बुरी स्थिति में जा सकती है 2017 में तो कुछ सीट आ भी गई थी सत्ता में रहते जिसे कुछ नही मिला अगर कुछ मिला था तो वह मोदी की भाजपा को मज़बूत करने के लिए प्रायोजित मुज़फ़्फ़रनगर के दंगे मिले थे इसके बाद भी मुसलमान पूरी मज़बूती से सपा कंपनी के साथ खड़ा था जबकि सत्ता में सबकुछ मिलने के बाद भी यादव वोट भाग गया था यानी साफ़-साफ कहा जाए तो यादव भी हिन्दू हो गया था यह बात सपा के एक मात्र मुस्लिम नेता आज़म खान जो इस समय योगी सरकार की द्वेष भावना की रणनीति का शिकार है जेल की सलाखों के पीछे ने कही भी थी मुलायम सिंह यादव की मौजूदगी में कि नेताजी मुसलमान खड़ा रहा और यादव भाग गया यही तीखी बातें अखिलेश यादव को आज़म खान की पसंद नही है बल्कि यूँ भी कहा जाए कि मुसलमान ही पसंद नही है तो ग़लत नही होगा सपा मुँह पर राम-राम बग़ल में छूरी रखती है मुसलमान इस बात को जितनी जल्दी समझ जाए उतना ही उसके भविष्य के लिए बेहतर है सपा की हालत ठीक नही लग रही क्योंकि वह योगी सरकार से सड़क पर लड़ने के लिए तैयार नही है वैसे यही हाल बसपा का भी है वह भी देखा जाए तो सड़क पर लड़ने को तैयार नहीं है वैसे बसपा का इतिहास सड़क पर लड़ने का नही रहा है वह तो सोशल इंजीनियरिंग पर विश्वास रखती है क्योंकि उसका वोटबैंक मज़बूत है उसको दिखाकर दूसरे वोट लेने का प्रयास करती हैं।योगी सरकार से सीधी टक्कर अगर कोई विपक्षी दल ले रहा है तो वह कांग्रेस है लेकिन उसके पास मज़बूत वोटबैंक नही है और उसे अपने अंदर के शत्रुओं से भी लड़ना पड़ रहा जिसकी वजह से योगी सरकार से सीधी टक्कर का उसे लाभ नही मिलता दिख रहा है हाँ अगर मुसलमान और ब्राह्मण ने उसकी चुनावी नय्या में सफ़र किया तो वह 2009 का चुनाव दोहरा सकती है।कुल मिलाकर यूपी के आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमान और ब्राह्मण तय करेंगे बसपा एवं कांग्रेस का चुनावी भविष्य।

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