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नौशेरा के शेर से कांपता था पाक, ऐसे दिलेर थे ब्रिगेडियर उस्मान

भारतीय सेना के उच्च अधिकारियों में से एक थे ब्रिगेडियर उस्मान। आज भी भारत में ब्रिगेडियर उस्मान को उनकी बहादुरी और दिलेरी के लिए जानता है। ब्रिगेडियर उस्मान ऐसे सैन्य अधिकारी थे जिन्हें “नौशेरा का शेर” कहा जाता है। ब्रिगेडियर उस्मान की देशभक्ति और बहादुरी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बंटवारे के समय मोहम्मद अली जिन्ना और लियाकत अली खान ने उन्हें पाकिस्तान में जाने की भरपूर कोशिश की, लेकिन ब्रिगेडियर उस्मान भारत में ही रहे। और इस मिट्टी के लिए शहीद हो गए।

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उस्मान का जन्म 15 जुलाई 1912 को ब्रिटिश इंडिया में मऊ ज़िले के बीबीपुर गाँव में हुआ। उनकी मां का नाम जमीलन बीबी था। उन्हीं की तरह उनके पिता भी बहादुर थे। उनके पिता का नाम मोहम्मद फ़ारूक़ था। उस्मान के पिता ब्रिटिश इंडिया में बनारस शहर के कोतवाल हुआ करते थे। अंग्रेजी हुकूमत ने उनके पिता को ख़ान बहादुर के खिताब से नवाजा था।

उस्मान बचपन से ही अपनी बहादुर थे। एक बार उस्मान कुएं के पास से गुज़र रहे थे। उन्होंने देखा कि चारों ओर भीड़ जमा है। जिसे देखकर वे कुछ देर रुक गए। जब उन्हें पता चला कि एक बच्चा कुएं में गिर पड़ा है तो उन्होंने आव देखा न ताव, उसे बचाने के लिए खुद कुएं में छलांग लगा दी।

घोसी तहसील के बीबीपुर निवासी ब्रिगेडियर उस्मान की वह हवेली आज भी मौजूद है जहां देश के लिए सर्वोच्‍च बलिदान देने वाले का बचपन बीता था। भाइयों का परिवार विदेश चला गया तो अन्‍य वारिस भी अब गांव की पुरानी हवेली छोड़कर शहरों की ओर रुख कर गए। वहीं गांव में आज भी नौशेरा के शेर की कहानियां पुरखों के जुबान पर बनी रहती है।

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ब्रिगेडियर उस्मान बचपन से ही हकलाया करते थे। इसीलिए उनके पिता को लगता था कि इस कमी के कारण उनका चयन सिविल सेवा में नहीं हो पाएगा। तब उन्होंने उस्मान को पुलिस में जाने के लिए प्रेरित किया। जब पुलिस में भर्ती होने के लिए उस्मान एक अंग्रेज अफसर के पास गए तो इत्तेफाकन वो अफसर भी हकलाया करता था। उस्मान ने जब अफसर को हकलाते हुए सवालों का जवाब दिया, तो अफसर को लगा उस्मान उनका मजाक उड़ा रहे हैं। इसी गलतफहमी के कारण उस्मान का पुलिस में भर्ती होने का सपना टूट गया।

पुलिस में सिलेक्शन न होने के बाद उस्मान ने सेना जाने का फैसला किया। उन्होंने सैंडहर्स्ट में जाने के लिए आवेदन किया था। जल्द ही उनका चयन भी हो गया। और 1 फ़रवरी 1934 को वो सैंडहर्स्ट से पास होकर पास हो गए। इस कोर्स में कुल 10 भारतीयों को चुना गया था, जिसमें से एक ब्रिगेडियर उस्मान शामिल थे। मात्र 35 साल की उम्र में उस्मान ब्रिगेडियर बन चुके थे। हालांकि, उनके जन्मदिन से 12 दिन पहले ही ब्रिगेडियर जंग-ए-मैदान में शहीद हो गए थे।

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आजादी और बंटवारे के समय उस्मान भारतीय सेना के एक मुस्लिम उच्च अधिकारी थे। इसलिए सभी को यह उम्मीद थी कि उस्मान पाकिस्तान में जाकर पाकिस्तानी सेना की में शामिल हो जायेंगे। मगर उन्होंने भारत में ही रहने का फ़ैसला किया। उस्मान बलूच रेजीमेंट के सदस्य हुआ करते थे। उनके ही रेजीमेंट के लोगों ने उनके इस फैसले पर पुनःविचार करने की सलाह भी थी।

ब्रिगेडियर उस्मान की बायोग्राफी के लेखक मेजर जनरल वीके सिंह बताते हैं, कि “मोहम्मद अली जिन्ना और लियाक़त अली दोनों ने उस्मान को पाकिस्तान ले जाने की भरपूर कोशिश की, यहां तक कि उन्होंने उस्मान को तुरंत पदोन्नति देने का लालच भी दिया। परंतु उस्मान ने अपना फैसला नहीं बदला। उस्मान ने जिन्ना को जवाब देते हुए कहा- मैं भारत में जन्मा हूं और इसी जमीन पर मैं आखिरी सांस लूंगा।” अपनी निष्पक्षता, ईमानदारी और न्यायप्रियता से उन्होंने अपने मातहत सिपाहियों का दिल जीत लिया था।”

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सेना में भर्ती होने के बाद मोहम्मद उस्मान ने 1945 में 10वीं बलूच रेजिमेंट की 14वीं की कमान संभाली। 1946 तक वह इस बटालियन के सदस्य रहे। विभाजन के बाद बलूच रेजिमेंट पकिस्तान में चली गई और मोहम्मद उस्मान का ट्रांसफर डोगरा रेजिमेंट में कर दिया गया। ऐसा कहा जाता है कि वह अपने साथी सैनिकों की भावनाओं की काफी कद्र करते थे, जिसके चलते वो खुद भी शाकाहारी हो गए थे।

विभाजन के बाद पाकिस्तान को कश्मीर न मिल पाने की जो टीस थी, वो आज भी उसके मन में चुभती रहती है। आजादी के तुरंत बाद पकिस्तान ने अपनी नापाक हरकतों को अंजाम देना शुरू कर दिया था। जब कश्मीर के राजा हरिसिंह ने पाकिस्तान में शामिल होने से इंकार कर दिया तो पाकिस्तान ने कबायली घुसपैठियों को जम्मू-कश्मीर की रियासत में अपना कब्ज़ा जमाने के लिए भेज दिया। पाकिस्तान की मंशा साफ थी कि कैसे भी जम्मू-कश्मीर पर कब्जा करके उसका विलय पाकिस्तान में कर दिया जाए।

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जिस समय पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कराई, उस वक्त मोहम्मद उस्मान 50 पैरा ब्रिगेड के कमांडर थे। इस ब्रिगेड को रणभूमि में मुश्किल चुनौतियों को पूरा करने का जिम्मा सौंपा गया था। मोहम्मद जम्मू-कश्मीर में तैनात थे और उन्हें नौशेरा की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।

1948 के शुरुआती महीनों में मोहम्मद उस्मान अपने सैनिकों के साथ नौशेरा में तैनात थे। पाकिस्तान लगातार कबायली लोगों की जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ करा रहा था। जिस समय पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए कबायली लोगों का सहारा लिया, उस वक्त भारत मात्र 5 महीने पहले ही आजाद हुआ था। युद्ध की कुछ भी तैयारी नहीं थी। युद्ध के सभी सैन्य और साजो सामान बिखरे हुए थे। संसाधनों कमी भी थी। लेकिन उस्मान जम्मू-कश्मीर की रक्षा का प्रण उठा चुके थे।

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नौशेरा में एक वक्त 5000 हजार कबायली नौशेरा में आ चुके थे। ये सभी मस्जिद में घुस गए और मस्जिद की आड़ में सेना पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। मस्जिद में छुपे कबायली घुसपैठियों पर जवाबी कार्रवाई करने में सैनिक हिचकिचा रहे थे। इस दौरान इस दौरान ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान ने कहा कि जब कबालियों ने मस्जिद में घुस कर फायरिंग की मस्जिद धार्मिक जगह नहीं रही। और तब कबायलियों पर पहली गोली ब्रिगेडियर उस्मान ने दागी। जिसके बाद सैनिकों का मनोबल बढ़ गया, फिर सैनिकों ने घुसपैठियों की एक-एक गोली का जवाब दिया।

इस युद्ध में दुश्मन की तादाद भारतीय सैनिकों से कहीं ज्यादा थी। इसके बावजूद इस लड़ाई में भारत के कुल 22 सैनिक शहीद हुए और 102 सैनिक जख्मी भी हुए। लेकिन दूसरी तरफ दुश्मन के लगभग 1000 लोग मारे गए और 1000 ही लोग जख्मी हुए। उनके इस बहादुरी से ब्रिगेड का नेतृत्व करने और दिलेरी भरे अभियान के लिए ब्रिगेडियर उस्मान को “नौशेरा का शेर” की उपाधि दी गई।

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नौशेरा की हार के बाद पाकिस्तान की बौखलाहट सामने आने लगी थी। मई 1948 में पाकिस्तान ने अपनी रेगुलर आर्मी को जम्मू-कश्मीर भेज दिया। इस वक्त उस्मान नौशेरा के झांगर में तैनात थे। यहां पर पाकिस्तान ने भयंकर गोलीबारी और शेलिंग शुरू कर दी थी। इसी लड़ाई में ब्रिगेडियर उस्मान वीरगति को प्राप्त हो गए। लेकिन अपनी जान देकर भी उन्होंने झांगर पर अपना कब्ज़ा कर लिया। ब्रिगेडियर उस्मान को उनके जोशीले नेतृत्व और साहस के लिए मरणोपरांत महावीर चक्र’ से सम्मानित किया गया था।

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