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राजनीतिक लाभ लेना ही दलित-मुस्लिम एकता का मकसद

इन दिनों दलित-मुस्लिम एकता की चर्चा फिर से होने लगी है। कई ऐसे नेता हैं, जो खुद को दलित-मुस्लिम एकता का पैरोकार बता रहे हैं। उनका मकसद आने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक लाभ लेना है। एक समय यही काम जोगेंद्र नाथ मंडल ने किया था। उनका जन्म पूर्वी बंगाल में हुआ था। 1939-40 में वह कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के करीब आए, लेकिन जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि कांग्रेस के एजेंडे में उनके समाज के लिए ज्यादा कुछ करने की इच्छा नहीं है। इसलिए वह मुस्लिम लीग से जुड़ गए और कुछ दिनों में ही वह जिन्ना के खास बन गए। उन्होंने बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के साथ मिलकर अनुसूचित जाति संघ को पूर्वी बंगाल में स्थापित किया। तब पूर्वी बंगाल की राजनीति में दलित और मुस्लिम समुदाय का वर्चस्व था। जब 1946 में सांप्रदायिक दंगे फैल गए, तब जिन्ना के कहने पर उन्होंने पूर्वी बंगाल के सभी क्षेत्रों में यात्र की और दलितों को मुसलमानों के खिलाफ हिंसा में भाग न लेने के लिए तैयार किया। उन्होंने दलितों को समझाया कि मुस्लिम लीग के साथ विवाद में कांग्रेस के लोग दलितों को इस्तेमाल कर रहे हैं।

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भारत विभाजन के बाद मंडल पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य और वहां के प्रथम कानून एवं श्रम मंत्री बने। 1947 से 1950 तक वह पाकिस्तान की तत्कालीन राजधानी कराची में रहे। जब पाकिस्तान बना तो मंडल के कहने पर लाखों दलित पाकिस्तान चले गए। पाकिस्तान निर्माण के कुछ वक्त बाद ही गैर मुस्लिमों को निशाना बनाया जाने लगा। हिंदुओं के साथ लूटपाट, दुष्कर्म की घटनाएं सामने आने लगीं। मंडल ने इस विषय पर सरकार को कई खत लिखे, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। उलटे उन्हें बाहर करने के लिए उनकी देशभक्ति पर संदेह किया जाने लगा।

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मंडल को इसका अहसास हुआ कि जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था, वह उनके रहने लायक नहीं है। उन्हें विश्वास था पाकिस्तान में दलितों के साथ अन्याय नहीं होगा, लेकिन लगभग दो साल में ही दलित-मुस्लिम एकता का मंडल का ख्वाब टूट गया। जिन्ना की मौत के बाद मंडल 8 अक्टूबर, 1950 को लियाकत अली खां के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर भारत आ गए। मंडल ने अपने खत में लिखा, ‘बंगाल में मुस्लिम और दलितों की एक जैसी हालत थी। दोनों ही पिछड़े और अशिक्षित थे। मुझे आश्वस्त किया गया था कि मुस्लिम लीग के साथ मेरे सहयोग से ऐसे कदम उठाए जाएंगे, जिससे बंगाल की बड़ी आबादी का भला होगा और हम सब मिलकर ऐसी आधारशिला रखेंगे, जिससे सांप्रदायिक शांति और सद्भाव बढ़ेगा। इन्हीं कारणों से मैंने मुस्लिम लीग का साथ दिया। 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिए मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन डे मनाया था। इसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए। कलकत्ता के नोआखाली नरसंहार में हजारों हिंदुओं की हत्या हुईं, सैकड़ों ने इस्लाम कुबूल किया। इसके बाद मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। मैने हिंदुओं के भयानक दुख देखे, फिर भी मैंने मुस्लिम लीग के साथ सहयोग की नीति को जारी रखा।’

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मंडल ने अपने त्यागपत्र में पाकिस्तान में दलितों पर हुए अत्याचार की कई घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने लिखा, ‘गोपालगंज के पास दीघरकुल में एक झूठी शिकायत पर स्थानीय नामशूद्र (दलित) परिवारों के साथ क्रूरता की गई। पुलिस के साथ मिलकर स्थानीय मुसलमानों ने नामशूद्र समाज के लोगों को पीटा और घरों को लूटा। निर्दोष हिंदुओं विशेष रूप से पिछड़े समुदाय के लोगों पर सेना और पुलिस ने हिंसा को बढ़ावा दिया। मुझे इस मामले में रिपोर्ट के लिए आश्वस्त किया गया, लेकिन रिपोर्ट नहीं आई।’

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मंडल आगे लिखते हैं, ‘खुलना जिले के कलशैरा में सशस्त्र पुलिस, सेना और स्थानीय लोगों ने निर्ममता से हिंदुओं के पूरे गांव पर हमला किया। मैंने 28 फरवरी 1950 को कलशैरा और आसपास का दौरा किया। वह स्थान खंडहर में बदल चुका है। लगभग 350 घरों को ध्वस्त कर दिया गया था। मैंने तथ्यों के साथ सूचना दी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। ढाका में नौ दिनों के प्रवास के दौरान मैंने दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया। नारायणगंज और चटगांव के बीच रेल पटरियों पर निर्दोष हिंदुओं की हत्याओं ने मुझे अंदर से झकझोर दिया। मैंने पूर्वी बंगाल के मुख्यमंत्री से मुलाकात कर दंगा रोकने का आग्रह किया। 20 फरवरी 1950 को मैं बारिसाल पहुंचा। यहां बड़ी संख्या में हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया। मैंने जिले के सभी दंगा प्रभावित इलाकों का दौरा किया, मधापाशा के जमींदार के घर में 200 लोगों की मौत हुई। मैंने खुद वहां नरकंकाल देखे, जिन्हें गिद्ध और कुत्ते खा रहे थे। वहां पुरुषों की हत्याओं के बाद महिलाओं को आपस में बांट लिया गया। पूर्वी बंगाल के दंगे में 10,000 से अधिक हिंदुओं की हत्याएं हुईं। महिलाओं और बच्चों का विलाप देख मेरा दिल पिघल गया और मैंने स्वयं से पूछा, क्या मैं इसी इस्लाम के नाम पर पाकिस्तान आया था?’

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मंडल ने अपने इस्तीफे में यह भी लिखा, ‘विभाजन के बाद पश्चिमी पंजाब में करीब एक लाख पिछड़ी जाति के लोग थे। उनमें से बड़ी संख्या को जबरन इस्लाम में मतांतरित किया गया। इसी तरह सिंध में रहने वाली पिछड़ी जाति की बड़ी संख्या को मुसलमान बनाया गया। इनका कारण एक ही है। हिंदू धर्म को मानने के अलावा इनकी कोई गलती नहीं है।’ आखिरकार लियाकत सरकार से इस्तीफे के बाद हताश-निराश मंडल भारत आ गए। कुछ वर्ष गुमनामी में बिताने के बाद पांच अक्टूबर, 1968 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

(लेखक सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता हैं)

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