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लोकतंत्र की सड़क पर कम पड़ी अहंकार की कीलें

तौसीफ़ क़ुरैशी
राज्य मुख्यालय लखनऊ

आज़ादी की लड़ाई के बाद इस दौर में भी ज़हरीली सियासी आबोहवा में एक बार फिर साबित हो गया है आज भी भारत में माफीवीर सावरकर व आतंकी गोड़से का गुणगान कर उनके नक़्शेक़दम पर चलने वाली सरकार के दौर में भी गांधीवाद ही भारी हैं। लाख कोशिशें करने के बाद भी आख़िरकार जीत किसानों की ही हुई है,अहंकार में चूर केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार को बैकफ़ुट पर आना ही पड़ा सीएए के विरोध में हुए आंदोलन को हिन्दू मुसलमान कर हल्का करने में कामयाब सरकार इसमें कुछ नहीं कर पायी।कृषि कानून रद्द करने से पश्चिम यूपी में मोदी की भाजपा को चुनावी राहत की उम्मीद, किसानों के दूसरे मुद्दे उठाएगा विपक्ष विपक्षी नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इलाके के आंदोलित किसान कृषि कानूनों से ज़्यादा एमएसपी, गन्ना बकाया, डीजल कीमतों और बिजली की ऊंची दरों को लेकर चिंतित हैं।

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विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों का गुस्सा कुछ हद तक शांत हो सकता है ऐसा विश्वास लिए हैं मोदी बीजेपी नेताओं को लगता है कि विवादास्पद काले कानूनों को रद्द करने के बाद जाट मतदाता पार्टी के पास वापस आ जाएंगे,लेकिन विपक्षी नेताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अकेले इस कदम से हवा का रुख भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मुड़ जाने की संभावना नहीं है।पश्चिमी उत्तर प्रदेश किसानों का इलाका है, जहां मुख्य रूप से जाटों और मुसलमानों का दबदबा है।

लोकतंत्र की सड़क पर कम पड़ी अहंकार की कीलें

2014 के लोकसभा चुनावों में और 2017 के विधानसभा चुनावों में व 2019 के लोकसभा चुनावों हिन्दू मुसलमान को आधार बनाकर जाटों ने भारी संख्या में मोदी की भाजपा को वोट दिया था जिसमें भाकियू के अध्यक्ष टिकैत परिवार भी शामिल था यह बात उन्होंने खुद स्वीकार की थी लेकिन यह साफ़ नहीं है कि उनके परिवार का आधार भी मोदी की भाजपा को वोट देना हिन्दू मुसलमान ही था। पश्चिमी यूपी के 14 जिलों में फैली 71 विधानसभा सीटों में से, जहां जाटों की एक अहम भूमिका होती है, 2017 में बीजेपी ने 51 सीटें जीतीं थीं।राष्ट्रीय लोकदल के एकमात्र विधायक सहेंदर सिंह रामला के भाजपा में शामिल होने के बाद, ये संख्या बढ़कर 52 हो गई।समाजवादी पार्टी ने 16 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस ने दो और बीएसपी तथा आरएलडी के हिस्से में एक-एक सीट आई थी।इस बार, आरएलडी-एसपी संभावित गठबंधन उम्मीद कर रहा था कि किसान आंदोलन की वजह से वो भाजपा की संख्या में सेंध लगा पाएगा। भाजपा नेताओं ने किसानों को आंदोलनजीवी और देश विरोधी कहकर पुकारा था।

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फिर अब किसान उन्हें वोट क्यों देंगे ? यह भी एक ऐसा सवाल है जो किसानों के ज़हन में घूम रहा है। ‘हज़ारों गन्ना किसानों को अपना बकाया भुगतान नहीं मिला है, पश्चिमी यूपी एक गन्ना क्षेत्र है और यहां पार्टियां गन्ने के मुद्दों पर हारती या जीततीं आई हैं, किसान ऊंचे बिजली बिलों से भी आहत हैं, इस लिए वो भाजपा को वोट क्यों देंगे ? सपा एक सूत्र ने बताया कि पार्टी अपना ध्यान किसानों के दूसरे मुद्दों की तरफ मोड़ेगी। सूत्र ने कहा, ‘पार्टी अब अपना ध्यान कई दूसरे स्थानीय मुद्दों पर लगाएगी, जैसे आवारा पशु, बिजली बिल, किसानों की आत्महत्याएं और यूरिया की किल्लत वगैरह, पार्टी ने सभी स्थानीय नेताओंको को ऐसी समस्याओं की सूची बनाने को कहा है, जिसे पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया जाएगा’।भाजपा को कानून वापसी से चुनावों में मोहलत की उम्मीद से प्रदेश भाजपा एक राहत की सांस ले रही है और उसे उम्मीद है कि कानून वापसी से पश्चिमी यूपी में लहर फिर उसके समर्थन वापस आ जाएगी जिसकी संभावना कम ही नज़र आ रही हैं ख़ैर यह तो चुनावी मौसम की शुरूआत में साफ़ हो पाएगा।

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भाजपा के नेताओं को लगता है कि हमारे खिलाफ एक नकारात्मक नेरेटिव तैयार करके, विपक्षी दलों ने उन्हें लुभाने का प्रयास किया, लेकिन दिल से वो हमारे साथ थे और अब वो हमें ही वोट देंगे’। भाजपा यह भी मान रही हैं कि किसानों का एक वर्ग मुस्लिम+यादव वोटबैंक के साथ एकजुट हो रहा था लेकिन अब वो समझ जाएंगे कि हम उनकी देखभाल करते हैं और हमारे पास लौट आएंगे. गैर-यादव ओबीसी हमारे साथ हैं, गुर्जर हमारे साथ हैं, इस लिए अगर जाटों का एक बड़ा वर्ग हमें वोट देता है, तो हम यहां से फिर भारी जीत हासिल करेंगे’, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक भाजपा के आशावाद से सहमत नज़र नहीं आते।

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राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि ‘कृषि कानूनों की वापसी विधानसभा चुनावों से बस कुछ महीने पहले ही हुई है, अब विपक्ष निश्चित ही इस बात को उठाएगा कि ये राजनीति से प्रेरित है, जिसका मकसद किसानों और खासकर जाटों के वोट हासिल करना है’। ‘अगर ये वापसी पहले हो जाती, तो भाजपा के लिए ज्यादा फायदेमंद रहती, लेकिन लगता है कि उन्होंने देर कर दी है, इन तीन कृषि कानूनों के अलावा, किसान दूसरे मुद्दों से भी बहुत नाराज़ हैं, जैसे एमएसपी, गन्ना किसानों का बकाया , यूरिया और आवारा पशु वगैरह, अगर आप किसी गांव में जाएं, तो आपको हर दूसरा व्यक्ति आवारा पशुओं के बारे में बात करता मिलेगा’। ‘इसके अलावा, पश्चिमी यूपी में जाटों का एक बड़ा वर्ग आरएलडी के पीछे दिख रहा है, जिसने मुसलमान के वोटबैंक के सहारे सियासत करने वाली पार्टी एसपी के साथ हाथ मिलाने की कोशिश की है अगर आप जाट, मुसलमान, और कुछ अन्य ओबीसी वर्गों को मिला लें, तो इस मेल के पास पश्चिम यूपी के 35 प्रतिशत से अधिक वोटों का असर होगा’।

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यह भी सवाल यूपी घूम रहा है कि क्या कृषि कानूनों की वापसी, चुनावों में कोई मुद्दा होगी या ‘लोग विकास और दूसरे स्थानीय मुद्दों पर वोट देंगे। क्या एक छोटा हिस्सा राष्ट्रवाद के मुद्दे पर भी वोट दे सकता है, क्योंकि जनता के बीच खासकर युवाओं में वो अभी भी मौजूद लग रहा है जो संघ ने उनकी नसों में भरा है, इस लिए कृषि कानूनों की वापसी का एक ‘गेम-चेंजर’ के तौर पर विश्लेषण करना सही नहीं है।आसमान छूती क़ीमतों ने आमजन का जीना मुहाल कर दिया है बढ़ती बेरोज़गारी युवाओं को निराशा की ओर धकेल रही हैं जो हमारे बच्चों के भविष्य के लिए ठीक नहीं हैं न खाऊँगा और न खाने दूँगा का दावा भी ग़लत साबित हो रहा है इस दौर में जितना भ्रष्टाचार किया जा रहा है पहले कभी नहीं देखा गया लाल-लाल ऑंखें दिखाने की भी बातें हवा हवाई साबित हुई है चीन हमारी सीमाओं में घुसपैठ करता है ऐसी ख़बरें आई और सरकार क्या दावे करती हैं यह हम सबको पता है और उन दावों में कितनी सदाक़त है यह भी सब जानते हैं और समझते हैं।

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यह तो कहा जा सकता है कि कुछ किया या नहीं किया हिन्दू मुसलमान का तड़का लगा कर अपने गुनाहों पर पर्दा डालने में कामयाब हो जाती हैं। यूपी चुनाव में भी यही तड़का लगा कर अपनी चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश की जाएगी यह यूपी की जनता को तय करना है कि वह हिन्दू मुसलमान को आधार बनाकर वोट करेंगी या देश व प्रदेश की तरक़्क़ी के लिए वोट करेंगी यह बाद में तय होगा।इस लिए पिछले एक साल से चल रहा किसान आंदोलन सरकार को गुटनों के बल लाने में सफल रहा इस लिए कहा जा सकता है कि लोकतंत्र की सड़क पर कम पडी़ अहकार की कीलें।

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