Sunday , July 5 2020

चुनावी हलचल से महकने लगी यूपी की सियासी ज़मीन

मिशन 2022 को लेकर कांग्रेस आगे, बसपा व सपा पीछे

Tauseef Qureshi

राज्य मुख्यालय लखनऊ से तौसीफ़ क़ुरैशी। कोरोना वायरस कोविड-19 की महामारी के बावजूद सियासी ज़मीन चुनावी हलचल से महकने लगी है देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में सभी सियासी दल चुनावी मोड़ में आ गए हैं। मोदी की भाजपा सरकार की उदासीनता के चलते अचानक लगाए गए लॉकडाउन से सबसे ज़्यादा अगर किसी ने परेशानियों का सामना किया है तो वह मज़दूर रहा उसको किसी भी राज्य की सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया जिसके बाद वह पैदल ही अपने-अपने गाँवों की ओर निकल पड़े भूखे प्यासे कैसे-कैसे किसी ने रेलवे लाइनों पर कटकर अपनी जान दे दी तो किसी को रोड पर स्थित पैदल चलते हुए या आराम करते हुए गाड़ियों ने मौक़े पर ही मौत के आग़ोश में सुला दिया तो किसी ने भूख प्यास के चलते अपने प्राणों को त्याग दिया ऐसे हालात में उन्होंने अपना सफ़र तय किया इसको लिखना आसान है लेकिन हक़ीक़त में उतना ही दर्दनाक है।

क्या इस बार के विधानसभा चुनाव में मज़दूरों का दर्द मुद्दा बनेगा ? मुझे लगता है कि शायद न बने क्योंकि जहाँ हिन्दू मुसलमान पर वोटिंग हो वहाँ इन दर्दनाक मुद्दों के कोई मायने नहीं होते। आगामी विधानसभा चुनावों 2022 में कोविड-19 से मजबूर सैंकड़ों हज़ारों किलोमीटर पैदल चलने वालों की मददगार बनी वह कांग्रेस है। कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव एवं यूपी की प्रभारी श्रीमती प्रियांका गांधी की सक्रियता से यूपी में आगे खड़ी दिखाई दे रही हैं। वहीं बहुजन समाज पार्टी व समाजवादी चुनावी रेस में पीछे दिखाई दे रही हैं सपा का फ़िलहाल का नेतृत्व एसी कोच में सफ़र कर सपा को सत्ता की दहलीज़ तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है और रही बात बसपा की उसका नेतृत्व तो पहले से ही अलग तरह की सियासत करता रहा है जिसमें वह अपने वोटबैंक को एकजुट रखने में सफल भी रही हैं यह बात अलग है कि बसपा को वह सफलता नहीं मिल पा रही है जिसकी वह अपेक्षा रखती हैं उसके कई कारण हैं एक तो मायावती को माना जाता है कि वह किसी की नहीं सुनती उनको जो ठीक लगता है वही करती हैं दूसरा सबसे बड़ा कारण मनुवादी व्यवस्था के हामी लोग उनके ख़िलाफ़ दुष्प्रचार करते हैं कि वह ठीक नहीं है तरह-तरह की मनगढ़ंत कहानी बनाकर जनता को गुमराह किया जाता है जिसकी वजह से पिछले दो चुनावों में बसपा सिर्फ़ अपने वोटबैंक तक ही सीमित रह गई जिसके चलते अपेक्षाकृत सफलता नहीं मिल पाई है क्या बसपा प्रमुख मायावती अपनी पूर्व की नीतियों में चुनाव जीतने के लिए बदलाव करेगी यह आने वाला समय बताएगा ?

बसपा अगर समय रहते अन्य जातियों पर सियासी डोरें डालें तो उसमें सबसे सरल मुसलमान है जिसे कुछ नहीं चाहिए सपा नेतृत्व ने आज तक कुछ नहीं दिया यह कड़वी सच्चाई है लेकिन वर्तमान नेतृत्व से पहले का नेतृत्व यानी मुलायम सिंह यादव मुसलमानों के सामने लेटने जैसी मुद्रा में आ जाते थे और बयानबाज़ी से मुसलमानों का बेवकूफ बनाया करते थे मुसलमान ख़ुश रहता था लेकिन अब सपा में मुसलमान से दूरी बनाकर रखी जा रही हैं सपा नेतृत्व का मानना है कि वह जाएगा कहाँ हमारे अलावा उसकी बात करें या न करे और यह बात मुसलमान महसूस भी कर रहा है कि सपा को हमारी ज़रूरत नहीं है अब सवाल उठता है कि बसपा प्रमुख मायावती क्या इतने बड़े वोटबैंक को अपने पाले में लाने के प्रयास करेंगी या नहीं यह सवाल बना रहेगा।सपा के मालिक अखिलेश यादव फ़िलहाल अपने दल को नए तरीक़े से चला रहे हैं कोविड-19 से परेशान मज़दूरों की मदद के लिए एक दो अपवाद को छोड़कर कहीं भी सपा कंपनी खड़ी नहीं दिखाई दी हमने कुछ ज़िलों में सपा नेताओं से यह बात जानने की कोशिश की कि क्या सपा नेतृत्व ने पूरे लॉकडाउन में आपसे कुछ जानकारी ली या दिशानिर्देश दिए कि आपको ग़रीबों की मदद करनी है तो नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कोई फ़ोन नहीं आया न ही इस दौरान कोई बात हुई एक सपा नेत्री का कहना था कि इस दौरान मैंने खुद बात करने की कोशिश की लेकिन तमाम जतन करने के बाद भी बात नहीं हो सकी उनका कहना था कि सपा नेतृत्व के क़रीब रहने वाले एक नेता से भी बात कर अखिलेश यादव से बात करवाने की बात कही तो उन्होंने ने भी बात करवाने में असमर्थता जता दी।ये हाल है फ़िलहाल के सपा नेतृत्व का क्या यही रणनीति आगामी विधानसभा चुनाव में आड़े नहीं आयेगी।

CAA, NPR संभावित NRC के मुद्दे पर भी समाजवादी कहीं नज़र नहीं आई थी सियासी गलियारों में चर्चा है कि सपा का नेतृत्व फ़िलहाल डरा और सहमा हुआ है जिसकी वजह से वह किसी भी मुद्दे पर मुखर होकर सरकार का विरोध करने की स्थिति में नहीं है सपा सुप्रीमो का बार-बार यह कहना कि सरकार ऐसा करने वालों को जेलों में डाल रही हैं तो क्या सपा के मालिक अखिलेश यादव जेल जाने से डर रहे हैं ? सपा के क़द्दावर नेता मोहम्मद आज़म खान को मोदी की भाजपा की योगी सरकार ने पचास से भी अधिक मुक़दमे लादकर जेल की सलाख़ों के पीछे भेज दिया और सपा के मालिक अखिलेश यादव ठीक से विरोध भी नहीं कर पाए क्या सपा नेतृत्व भी आजम खान से पिंड छुड़ाना चाहता है यह भी एक सवाल सियासी गलियारों में चर्चा का विषय है ?

योगी सरकार के सत्ता में आते ही यादव जाति के कुछ सिपाहियों का स्थानांतरण किया था उस पर तो सपा के अखिलेश यादव ने ज़ोरदार तरीक़े से विरोध किया था कि जाति विशेष को परेशान किया जा रहा है उसी टाईम प्रदेश भर में पशुवधशालाओ को अवैध बताकर बंद कर दिया गया था जो आज तक बंद है मान लिया पशुवधशाला अवैध थी लेकिन वैध बनाने की ज़िम्मेदारी किसकी है क्या सरकार से यह नहीं कहा जा सकता है कि इस समस्या का समाधान कराया जाए लेकिन किसी भी दल ने कोई आवाज़ नहीं उठाई जिसकी वजह से बहुत लोग बेरोज़गार हो गए थे लेकिन उनकी कोई सुध लेने वाला नही है इसके बाद भी मुसलमान सपा का बँधवा मज़दूर बनकर साथ खड़ा रहा है ऐसे बहुत मुद्दे है जिनपर सपा नेतृत्व को सवालिया घेरे में खड़ा किया जा सकता है ख़ैर मिशन 2022 की तैयारियों को लेकर सपा पीछे खड़ी दिखाई दे रही हैं यह बात अलग है कि चुनाव आँतें-आँतें क्या हालात बनते हैं फ़िलहाल सपा कंपनी चुनावों को लेकर फिसड्डी साबित हो रही हैं।

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की राष्ट्रीय महासचिव एवं यूपी की प्रभारी श्रीमती प्रियांका गाँधी बेदम कांग्रेस को ज़िन्दा करने के लिए जी-तोड़ मेहनत कर रही हैं चाहे कोई भी मुद्दा हो श्रीमती प्रियांका गाँधी योगी सरकार पर निशाना साधने में देर नहीं लगती हैं चाहे उन्नाव का रेप कांड हो या सोनभद्र में सामूहिक रूप से किए गए हत्याकाण्ड हों कानपुर की घटना हों या लखनऊ में और आज़मगढ़ में मुज़फ़्फ़रनगर में CAA, NPR संभावित NRC को लेकर देशभर हो रहे आंदोलन में शामिल लोगों पर यूपी सरकार के द्वारा किए गए अत्याचार का अगर किसी ने डटकर विरोध किया तो वह काँग्रेस ही थी बाक़ी दल दुम दबाकर बैठे हुए थे। चाहे अब कोविड-19 से उपजे हालात हों कांग्रेस ही मज़दूरों की परेशानियों में सड़क पर खड़ी थी मज़दूरों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही थी मज़दूर पैदल न चले इसके लिए यूपी कांग्रेस ने राजस्थान सरकार से एक हज़ार बसों का प्रबंध कराया जिसको यूपी की योगी सरकार ने क़ानूनी फेर में फँसाकर बसें नहीं ली उलटे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और प्रियांका गाँधी के निजी सचिव के ख़िलाफ़ हज़रतगंज कोतवाली में तथा लल्लू के ख़िलाफ़ प्रदेश के दो जनपदों आगरा व लखनऊ में FIR दर्ज कराई गई जिसका ख़ामियाज़ा यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को जेल जाकर चुकाना पड़ा है और वह अभी तक जेल में ही है जिसके साथ पूरी कांग्रेस मज़बूती से खड़ी होकर अपना विरोध दर्ज करा रही हैं बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव श्रीमती प्रियांका गाँधी ने एक कदम आगे बढ़ते हुए अपने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की हिमायत में कलम उठाकर लेख भी लिखा जो लगभग सभी अख़बारों ने छापा है जिसको बहुत ही सकारात्मक माना जा रहा है इससे पहले कभी गाँधी परिवार के किसी सदस्य ने इतनी मज़बूती से अपने नेता का पक्ष जनता के सामने नहीं रखा है।रही बात मोदी की भाजपा की तो वह अपने आपको दुनियाँ की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती हैं जिसने कोविड-19 जैसी महामारी में देश की जनता को अपने हाल पर छोड़ दिया है और चुनावी मैदान में कूद गई है 72000 LAD लगाकर वर्चुअल रैली की है बिहार और पश्चिम बंगाल से क्योंकि यही प्रदेश है जहाँ बिहार में इस साल के आख़िर में और पश्चिम बंगाल में 2021 के शुरू में चुनाव संभावित है विपक्ष का आरोप है दुनियाँ की सबसे अमीर पार्टी वर्चुअल रैली पर 144 करोड़ रुपये खर्च कर सकती है लेकिन मज़दूरों की मदद को एक धेला नहीं देती उनको छोड़ देती हैं भूखे प्यासे मरने के लिए इससे दुनियाँ की सबसे अमीर पार्टी की पोल खुलती हैं कि वह कितनी संवेदनशील है उसके पास सिर्फ़ चुनाव के लिए पैसा है ग़रीबों के लिए नही।इस लिए कहा जा सकता है कि यूपी में कांग्रेस बसपा और सपा से आगे चल रही हैं। क्या कांग्रेस बसपा व सपा का यही ग्राफ 2022 तक बना रहेगा यह भी एक सवाल है जो आगामी विधानसभा चुनावों तक बना रहेगा।क्योंकि सियासी दलों की चुनावी टीआरपी घटती बढ़ती रहती हैं।

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