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क़ुरआन की वे आयतें, जिन्हें हटाने के लिए खटखटाया गया है सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा​

उत्तर प्रदेश के शिया वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने क़ुरआन की 26 आयतों को हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाख़िल की है। इस पर मुस्लिम समुदाय में वसीम रिज़वी के प्रति ज़बरदस्त गुस्सा है। देशभर में उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। उनका सिर कलम करने के लिए एक के बाद एक इनाम का ऐलान किया जा रहा है। शिया संगठन ईरान से उनके खिलाफ उसी तरह का मौत का फतवा जारी करने की मांग कर रहे हैं जैसा कि 90 के दशक में सलमान रुश्दी के खिलाफ जारी किया गया था।

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दरअसल वसीम रिजवी ने अपनी याचिका में देश भर के 57 मुस्लिम संगठनों को भी पार्टी बनाया है। इनमें ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड, जमात-ए-इस्लामी, जमीयत उलेमा-ए-हिंद समेत सुन्नी और शिया मुसलमानों के अलग-अलग फिरकों और मसलकों से जुड़े संगठन शामिल हैं। उनके वकील ने दावा किया है कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने से पहले इन तमाम संगठनों को बाकायदा चिट्ठी भेजकर क़ुरआन की उन 26 आयतों के बारे में उनकी राय पूछी गई थी। जवाब नहीं आने पर उन्हें पार्टी बनाया गया है। अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करता है तो उन्हें वहां अपना पक्ष रखना होगा।

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ज़ाहिर है कि वसीम रिज़वी ने मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मार दिया है। इसीलिए उनके ख़िलाफ़ तमाम शिया-सुन्नी और वो तमाम मसलकों और फ़िरक़ों के मुस्लिम संगठन एक सुर में बोल रहे हैं। जो एक-दूसरे के पीछे नमाज़ तक नहीं पढ़ते। एक दूसरे की मस्जिदों में क़दम तक नहीं रखते। ऐसा इसलिए है कि वसीम रिज़वी ने क़ुरआन की विश्वसनीयता पर ही सवाल उठा दिया है। उन्होंने 1400 साल पुराने शिया-सुन्नी विवाद की पर्ते नए सिरे से उधेड़ने की कोशिश की है। इसलिए उनके खिलाफ तमाम धुर विरोधी मुस्लिम धड़ों में एकता नजर आ रही है।

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मसलकों, फिरकों और दूसरी तरह के मतभेदों के बावजूद तमाम मुसलमानों का यह अक़ीदा (आस्था) है कि क़ुरआन एक आसमानी किताब है। यह किताब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद (सअव) पर थोड़ा-थोड़ा करके 23 वर्षों में अवतरित हुई। दूसरा अक़ीदा यह है कि ये एक मुकम्मल किताब है। इसमें कभी कोई छेडछाड़ या बदलाव नहीं हुए और न भविष्य में हो सकते हैं। लिहाज़ा कोई भी इसमें किसी तरह की कांट-छांट कर ही नहीं सकता। इसमें न कुछ नया जोड़ा जा सकता है और नहीं इसमें से कुछ हटाया जा सकता है। तीसरा अक़ीदा यह है कि अल्लाह ने खुद इस किताब की हिफ़ाज़त (रक्षा) की ज़िम्मेदारी ली है।

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क़ुरआन भी हर किताब की तरह कुछ भागों में बंटा हुआ है। इसमें तीस सिपारे हैं। उन्हें पारे भी कहा जाता है। पूरे क़ुरआन को एक साथ पढ़ने के बजाय थोड़ा-थोड़ा करके पढ़ने और हिफ़्ज (याद करने/कठंस्थ करने) करने में सहूलियत के लिए ऐसा किया गया है। क़ुरआन मूल रूप से 114 अध्यायों में बंटा हुआ है। इन्हें सूरः कहते हैं। हर सूरः को एक नाम दिया गया। सूरः में आयतें होती हैं। आयत एक वाक्य होता है। कुछ आयतें बहुत छोटी हैं और कुछ बड़ी हैं। क़ुरआन की सबसे बड़ी सूरः अल-बक़रा है। इसमें 286 आयतें हैं। सबसे छोटी सूरः अल-कौसर है। इसमें सिर्फ़ तीन आयतें हैं। पूरे क़ुरआन में कुल 6,666 आयतें हैं।

वसीम रिज़वी ने अपनी याचिका का मूल आधार देश में बढ़ते इस्लामी आतंकवाद को बताया है। उनका दावा है कि क़ुरआन की कुछ आयतें इसके लिए ज़िम्मेदार है। मदरसों में इन आयतों के जरिए बच्चों का ब्रेनवाश किया जाता है। इसकी वजह से बड़े होकर बच्चों का झुकाव आतंकवाद की तरफ़ हो जाता है। वसीम रिज़वी का दावा है कि इस्लामी आतंकवाद देश के लिए बड़ा खतरा है और ये ख़तरा बढ़ता जा रहा है।

ये भी कहते हैं कि क़ुरआन का मूल संदेश मानव कल्याण के लिए काम करने का है। बहुत सी आयतों में अल्लाह ने पूरी इंसानियत की भलाई के आदेश दिए हैं, लेकिन ये 26 आयतें उनके ख़िलाफ़ हैं।

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वसीम रिज़वी का दावा है कि अल्लाह अपनी किताब में विरोधाभासी बातें नहीं कह सकता। यह संभव नहीं है कि एक तरफ़ तो अल्लाह ‘तुम्हारा दीन तुम्हारे लिए और मेरा दीन मेरे लिए’ यानि अलग-धर्मों को मान्याता दें। आपस में फ़साद फैलाने को सख़्ती से मना करे और दूसरी तरफ़ इस्लाम को नहीं मानने वालों को मारने का आदेश दे। वसीम रिज़वी का आरोप है कि मानव कल्याण और अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच सहअसतित्व की भावना के साथ रहने का आदेश देने वाली क़ुरआन की आयतों के खिलाफ़ ग़ैर मुस्लिमों को मारने का आदेश देने वाली आयतें मूल क़ुरआन का हिस्सा नहीं हैं। इन्हें मुहम्मद (सअव) साहब के बने तीन ख़लीफ़ाओं ने अपनी ताक़त का इस्तेमाल करके क़ुरआन में जोड़ दिया था। इस्लामी इतिहास के मुताबिक़ मुहम्मद (सअव) साहब के जीवनकाल में क़ुरआन किताब की शक्ल में मौजूद नहीं था। मुहम्मद (सअव) साहब पर जब कोई आयत अवतरित होती थी तो वो उनके पास मौजूद लोगों को सुना देते थे। उनमें से जो लिखना जानते थे वो लिख लेते थे। बाक़ी लोग उसे याद कर लेते थे। कुछ लोगों को पूरा क़ुरआन ज़ुबानी याद था। इनमें से बड़ी संख्या में यमामा की लड़ाई में शहीद हो गए थे। तब पहले ख़लीफ़ा अबू बक्र ने हज़रत उमर से सलाह मशविरा करके क़ुरआन का आयतों के जमा करके इसे किताब की शक्ल देने का काम शुरू किया। हज़रत उमर दूसरे ख़लीफ़ा बने। लेकिन क़ुरआन को किताबी शक्ल देने का काम तीसरे ख़लीफ़ा हज़रत उस्मान के काल में पूरा हुआ।

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वसीम रिज़वी ने अपनी याचिका में बताया है कि सबसे विश्वसनीय मानी जानी वाली हदीस बुख़ारी शरीफ़ में बताया गया है कि चार सहाबा (मुहम्मद साहब के साथी) को पूरा क़ुरआन याद था। उन्हीं की याददाश्त के आधार पर मौजूदा क़ुरआन लिखा गया था। शिया-सुन्नी विवाद को उठाते हुए वसीम रिज़वी ने आरोप लगाया है कि उस समय हज़रत अली की पूरी तरह अनदेखी की गई। जबकि उनके पास असली क़ुरआन थी। वसीम रिज़वी का आरोप है कि पहले तीनों ख़लीफाओं ने क़ुरआन अपनी मर्जी की आयतें लिखवाकर मौजूदा क़ुरआन तैयार कराया और इसके अलावा जितने भी क़ुरआन उस समय मौजूद थे उन सबको जला दिया था। ये सारी बातें उन्होंने हदीसों के हवाले से कही हैं।

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वसीम रिज़वी को क़ुरआन की 6,666 आयतों में से सिर्फ़ पांच आयतें ऐसी मिली हैं जिनमें में उनके मुताबिक़ अल्लाह की तरफ़ से मानव कल्याण और आपसी भाई चारे का आदेश दिया गया है। इन आयतों को उन्होंने अपनी याचिका में शामिल किया है। ये पांच आयतें हैः

1. सूरः न. 2 (अल-बक़रा) की आयत न.11 और 255
2. सूरः न. 5 (अल-माइदा) की आयत न. 32
3. सूरः न. 31 (लुकमान) की आयत न. 18
4. सूरः न. 109 (अल-काफ़िरून) की आयत न. 6

इन आयतों की मूल भावना के खिलाफ़ बताते हुए जिन 26 आयतों को हटाने की मांग की हैं उन्हें वसीम रिज़वी ने अपनी याचिका में ए टू ज़ेड लिस्ट किया है। क़ुरआन की 12 सूरः में इन आयतों को बीच-बीच में से चुना गया है। क़ुरआन में मौजूद सूरः की तरतीब के हिसाब से वो 26 आयतेंं ये हैं।

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1. सूरः न. 2 (अल-बक़रा) की आयत न. 191
2. सूरः न. 3 (आले-इमरान) की आयत न. 151
3. सूरः न. 4 (अल-निसा) की आयत न. 56, 89 और 110
4. सूरः न. 5 (अल-माइदा) की आयत न. 14, 51 और 57
5. सूरः न. 8 (अल-अनफाल) की आयत न. 65 और 69
6. सूरः न. 9 (अत-तौबा) की आयत न. 5, 14, 23, 28, 29, 37, 58, 111 और 123
7. सूरः न. 21 (अंबिया) की आयत न. 98
8. सूरः न. 32 (अस-सजदा) की आयत न. 22
9. सूरः न. 33 (अल-अहज़ाब) की आयत न. 61
10. सूरः न. 41 (फुस्सिलात) की आयत न. 27 और 28
11. सूरः न. 48 (अल-फतेह) की आयत न. 20
12. सूरः न. 66 (अत-तहरीम) की आयत न. 9

इन आयतों का सही अर्थ और भावार्थ तभी समझा जा सकता है जब उन्हें पिछली और अगली आयतों के साथ पढ़ा जाए। साथ ही ये भी देखना होगा कि ये आयतें किस काल और किस संदर्भ में अवतरित हुईं। जिन आयतों पर आपत्ति हैं वो आयतें उस समय अवतरित हुई जब हज़रत मुहम्मद (सअव) साहब के साथ ही उनके परिवार और उनके सहयोगियों पर ज़ुल्म इतने बढ़ गए कि उन्हें मक्का छोड़कर मदीना जाना पड़ा। वहां भी उन्हें मारने के लिए कई बार मदीने पर चढ़ाई की गई। बाद में मक्का वाले के साथ एक संधि हुई। इस ऐतिहासिक संधि को ‘सुलह हुदैबिया’ के नाम से जाना जाता है।

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इस संधि में दोनों के बीच दस साल तक कोई युद्ध नहीं करने पर सहमति बनी थी। लेकिन एक साल बाद ही मक्का वालों ने संधि तोड़ दी। मक्का में मौजूद हज़रत मुहम्मद (सअव) के समर्थक क़बीले के लोगों को रात के अंधेरे में मार दिया गया। इस घटना के बाद मुसलमानों को उन ज़ालिमों से बदला लेने का आदेश हुआ। इसमें भी सिर्फ उन्हीं से बदला लेने का आदेश है जिन्होंने ज़ुल्म किया। साथ ही माफ़ी मांगने और लड़ाई के बीच हथियार डालने के स्थिति में उन्हें माफ़ करने का भी आदेश है। ये सारी बातें तभी साफ़ हो पाएंगी जब आयतों को उनके सही क्रम में पढ़ा जाए। बीच में से निकाल कर किसी भी अकेली आयत को पढ़ने से अर्थ का अनर्थ होने की आशंका बनी रहेगी।

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दरअसल कुछ हिंदू संगठन क़ुरआन की इन आयतों के लेकर काफ़ी पहले से दुष्प्रचार करते रहे है। 1980 के दशक में कुरआन की 24 आयतों के लेकर हिंदू महासभा ने एक पोस्टर छापा था। उसकी मांग इन आयतों को क़ुरआन से हटाने की थी। इसके लिए हिन्दू रक्षा दल दिल्ली के तात्कालीन उपप्रधान इन्द्रसेन शर्मा और सचिव राजकुमार आर्य पर दिल्ली के हौजकाज़ी थाने आईपीसी की धारा १५३ए और २६५ए के अन्तर्गत एफआईआर दर्ज हुई। मुकदमा चलाया गया। हालांकि दोनों आरोपी बरी हो गए थे। लेकिन तब क़ुरआन की आयतों को लेकर काफ़ी विवाद हुआ था।

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इस मामले में मैट्रोपोलिटिन मजिस्ट्रेट जेड़ एस. लोहाट ने 31 जुलाई 1986 को फैसला सुनाया था। तब अपने फ़ैसले में लिखा था, ‘मैंने सभी आयतों को क़ुरआन मजीद से मिलान किया और पाया कि सभी अधिकांशतः आयतेंं वैसे ही उधृत की गई हैं जैसी कि क़ुरआन में हैं। लेखकों का सुझाव मात्र है कि यदि ऐसी आयतेंं न हटाईं गईं तो साम्प्रदायिक दंगे रोकना मुश्किल हो जाऐगा। मैं ए.पी.पी. की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आयतेंं 2,5,9,11 और 22 क़ुरआन में नहीं है या उन्हें विकृत करके प्रस्तुत किया गया है।”

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दरअसल क़ुरआन को लेकर दुष्प्रचार करने का कुछ हिंदू संगठनों का वर्षों पुराना एजेंडा रहा है। अब वसीम रिज़वी इसी एजेंडे को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए हैं। उन पर लगातार हिंदू संगठनों के हाथों में खेलने का आरोप लगता रहा है। वसीम ख़ुद शिया मुसलमान हैं। वो इस क़ुरआन को लेकपर मुसलमानों के अक़ीदे के बारे में अच्छी तरह जानते हैं।

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फिर उन्होंने ऐसा क़दम क्यों उठाया है, ये वो ही बेहतर जानते उन्हें नोटिस जारी करके 21 दिनों में क़ुरआन के बारे में दिए बयान वापिस लेने और बग़ैर शर्त माफ़ी मांगने को कहा है। ऐसा नहीं करने के सूरत में उनरके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 153ए और 295ए के तहत मुक़दमा चलाया जाएगा।

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अब देखना यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करेगा? इसे सुनवाई के लायक़ नहीं मानते हुए ख़ारिज करेगा या फिर वसीम रिज़वी ख़ुद इसे वापिस ले लेंगे? जो भी हो पांच राज्यों के चुनावों के बीच कुरआन की कुछ आयतों को देश में इस्लामी आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार मानकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देना मुसलमानों के ख़िलाफ़ लगातार फैल रही नफ़रत में इज़ाफ़ा करने की साज़िश भी हो सकती है। इस बहाने में चुनावों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कराने का मंसूबा भी हो सकता है।

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