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जम्मू कश्मीर की नासिरा अख्तर के आविष्कार से दुनिया हुई दंग

दुनियां में प्लास्टिक और उससे होने वाले नुक़सानात को लेकर हमेशा से चिंता रही है ऐसा नहीं है की सिर्फ चिंता ही है दुनिया में प्लास्टिक कचरे के निस्तारण को लेकर पिछले कई सालों से कोशिशें भी चल रही हैं। कहते हैं कोशिशों से ही कामयाबी मिलती है इन्हीं कोशिशों के बीच जम्मू कश्मीर की नासिरा अख्तर ने प्लास्टिक की समस्या का समाधान निकाल लिया है।

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कश्मीर के कनीपोरा कुलगाम की रहने वाली नासिरा अख्तर हैं यद्यपि मेट्रिक तक पढ़ सकीं उसके बाद पढ़ाई छोड़नी पड़ी, इनके नाम एक ऐसा कारनामा है जिसके लिए दुनिया भर के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद एक अरसे से कोशिश कर रहे थे मगर कोई सफलता नहीं मिल सकी थी, नासिरा अख्तर ने जैविक विधि से प्लास्टिक कचरे को राख में बदलने का कारनामा किया उन्होंने एक ऐसी जड़ी बूटी का पेस्ट तैयार किया जिससे प्लास्टिक कचरे पॉलीथिन आदि को राख में बदला जा सकता है और कोई प्रदूषण नहीं होता।

नसीरा अख्तर ने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को हैरत में डाल दिया है और पर्यावरणविदों को पीछे छोड़ते हुए प्लास्टिक वेस्ट मैनेजमेंट का एक जैविक और अनोखा तरीका निकाला है। इंडिया बुक आफ रिकॉर्ड्स अनसंग इनोवेटर्स आफ कश्मीर और कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के जर्नल में उसकी कहानी प्रकाशित हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

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एक इंटरव्यू में नासिरा अख्तर ने बताया कि जैविक तरीके से प्लास्टिक को राख बनाने के फॉर्मुले को उन्होंने एक निजी कंपनी को बेच दिया है और अब फिर से एक नई खोज में जुट गईं हैं। वह बताती हैं की बीस साल पहले से इस आइडिया पर काम कर रही हूं।

एक बार मैं धर्म की किताब पढ़ रही थी जिसमें एक लाइन लिखी थी कि इस दुनिया का अंत होगा तो आखिर में अल्लाह और प्लास्टिक बचेंगे। इस वाक्य़ पर मुझे एतराज था। मुझे लगा कि प्लास्टिक जैसी चीज को इस दुनिया से खत्म किया जाना चाहिए।

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इसके लिए मैंने कई जैविक तरीके से शोध किए। अलग अलग चीजों को प्लास्टिक पर आजमाने लगी। 20 साल के बाद मुझे सफलता हासिल हुई। प्लास्टिक इस उपाय से राख में तब्दील हो जाती है। तरीका बहुत जैविक है। तरीके के बारे में ज्यादा बता नहीं सकती क्योंकि आइडिया एक निजी कंपनी को बेच दिया है।

नासिरा आगे बताती हैं कुलगाम जो महिलाओं की साक्षरता के मामले में पिछड़ा जिला है जहां से मैं आती हूँ। मैं ज्यादा पढ़-लिख भी नहीं पाई, 10वीं पास हूँ। औषधीय पेड़ पौधों का थोड़ा बहुत पारंपरिक ज्ञान था। उन्हीं पेड़ पौधों से तैयार चीजों से प्लास्टिक को राख बनाने का तरीका निकाल लिया।

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फिर लोगों की सलाह पर मैं कश्मीर यूनिवर्सिटी गई, वहां मैंने प्लास्टिक को जैविक पदार्थ से जला कर दिखाया। कई बार मेरे इस प्रयोग की जांच की गई। वैज्ञानिकों ने भी इस फार्मुले को सही माना। फिर अंत में मैंने इसे एक निजी कम्पनी को इस उपाय का पेटेंट बेचने का निर्णय लिया ताकि पूरी दुनिया इसका फ़ायदा उठा सके। कम्पनी को जब स्टार्टअप मिलेगा तो वो इस पर काम करेगी। इसका लाभ मुझे भी मिलेगा।

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