Friday , July 1 2022

आरफा खातून की जागरूकता से पूरा गांव हुआ टीकायुक्त

आरफा खातून कोई सामाजिक कार्यकत्री नहीं हैं लेकिन 12 वीं पास 21 साल की मजदूर की इस बेटी ने पिछले 25 दिनों में वो कर दिखाया है जो सरकार नहीं कर पा रही थी। आरफा की ओर से लगातार फैलाई जा रही जागरूकता के चलते आखिरकार गांववालों की हिचक खत्‍म हुई और मुस्लिम बाहुल्‍य पूर्णिया प्रमंडल का ये अनिच्‍छुक और दूरवर्ती गांव दूसरों के लिए मिसाल बन गया।

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पूर्णिया प्रमंडल (जिसे सीमांचल के नाम से भी जाना जाता है) में अररिया, किसानगंज, पूर्णिया और कटिहार चार जिले आते हैं। यहां की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी मुसलमानों की है। बैसी उप प्रमंडल का गांव गुरहियाल भी एक मुस्लिम बाहुल्‍य गांव है। पूर्णिया से 30 किलोमीटर दूर स्थिति यह गांव कोविड-19 टीके की पहली डोज से पूरी तरह लैस हो गया है। जबकि यहां टीकाकरण को लेकर लोगों में सर्वाधिक हिचक थी।

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चार भाई-बहनों में सबसे बड़ी आरफा टीवी समाचार और अखबारों के जरिए दुनिया-जहां से काफी वाकिफ रहती हैं। आरफा ने अपने पूरे गांव को कोरोना के टीकों से सुरक्षित कराने का बीड़ा उठाया। उन्‍होंने इसे अपना मिशन बना लिया। आरफा कहती हैं- ‘मुझे यह सुनकर बुरा लगता था कि टीकाकरण टीम को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। अखबार ऐेसी खबरों से भरे रहते थे जिनसे पता चलता था कि कोविड-19 के टीके लगवाने को लेकर ग्रामीण कितने अनिच्‍छुक हैं। मैं इसे बदलना चाहती थी और तब मैंने इसे एक चुनौती की तरह लिया।’

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आरफा बताती हैं, ‘मैं रोज सुबह जल्‍दी उठती हूं। नहाने और नाश्‍ता करने के बाद मैं घर से निकलकर गांव के हर घर पर दस्‍तक देने लगी। शुरुआत में मुझे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा क्‍योंकि लोग टीके लगवाने को तैयार नहीं थे। लेकिन मैने हार नहीं मानी।’ आरफा के गांव के 90 प्रतिशत लोग प्रवासी मजदूर और सीमांत किसान हैं। गांव में सिर्फ एक सरकारी मिडिल स्‍कूल है। आरफा बताती हैं, ‘सबसे पहले मैने तय किया कि मैं स्‍कूली बच्‍चों के बीच जागरूकता अभियान चलाऊंगी। लेकिन फिर मुझे इससे पीछे हटना पड़ा क्‍योंकि कोरोना के चलते स्‍कूल तो लंबे समय से बंद चल रहे हैं।

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निश्चित ही गांववालों को टीके लगवाने के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी लेकिन सौभाग्‍यवश मैं उन्‍हें इसके लिए प्रोत्‍साहित कर सकी। शुरू-शुरू में गांववाले खासकर महिलाएं अपने घरों में जाकर कहीं छिप जाती थीं। कुछ लोगों ने कहा कि उन्‍हें टीका लगने के बाद बुखार आ जाएगा। लेकिन 25 दिनों तक लगातार प्रयास करने के बाद नतीजे मिले। मैं इस बात से बहुत ज्‍यादा खुश हूं कि अब गांववालों का विश्‍वास बढ़ा है और वे दूसरी डोज लगवाने के लिए मुझसे सम्‍पर्क कर रहे हैं।’

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वह गर्व पूर्वक बताती हैं-‘जब 50 साल के मो.इरफान ने न सिर्फ टीके लगवाने से इनकार कर दिया बल्कि गांव में इसका जोरदार विरोध भी करने लगे तो मैं नर्वस हो गई थी। तब मैने तय किया कि मैं उनके घर जाऊंगी और चार दिन तक लगातार ऐसा करने के बाद आखिरकार वह भी टीका लगवाने के लिए राजी हो गए। मैने उन्‍हें भरोसा दिलाया कि मैं भी उनके साथ ही टीका लगवाऊंगी।’ जब गांव के सभी लोग तैयार हो गए तब पूर्णिया के जिलाधिकारी के सहयोग से गांव में लगातार पांच दिनों तक टीकाकरण कैंप लगाकर हर योग्‍य व्‍यक्ति को टीका लगवाया गया।’ आरफा फख्र से कहती हैं- ‘मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मो.इरफान जो शुरुआत में टीकाकरण अभियान का जोरदार विरोध कर रहे थे वही अब इसके समर्थन में जोरशोर से आगे आए हैं और आज इस अभियान के चलते हमारा गांव क्षेत्र के दूसरे गांवों के लिए मिसाल बन गया है।’

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आरफा ने टीके लगवा चुके लोगों की एक टीम बनाई जो आसपास के गांवों में कोविड-19 टीकाकरण अभियान को लेकर जागरूकता का अभियान चला रही है। वह कहती हैं-‘यदि दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों को टीकाकरण के लिए तैयार करने में सफल रहे तो हम इस महामारी से जंग जीत सकते हैं।’ बैसी उप प्रमंडल में बैसी, आमोर, बैसा और दगारुआ चार ब्‍लॉक आते हैं। इनमें से 1,66, 628 लाख लोगों को अब तक कोरोना का टीका लगाया जा चुका है। पूर्णिया जिले में अब तक 7, 82,381 और पूरे बिहार में 2.35 करोड़ लोगों को टीका लगाया जा चुका है।

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